इसी बहाने-उगलने के बावजूद कम नहीं होता जहर

इसी बहाने-(आशीष शुक्‍ला)! कहते हैं जैसे जैसे वक्त बीतता है किसी भी व्यक्ति के मन से नफरत कम हो जाती है। दिमाग का जहर जुबां पर आकर खत्म हो जाता है लेकिन यहां तो मामला बिल्कुल ही उलट है वक्त जैसे जैसे नजदीक आता है जुबां से जहर बुझे तीर और भी गहराई पर वार करने लगते हैं। देश की राजनीति में इन दिनों जहर जमकर उगलने का सिलसिला जारी है किंतु खास यह नहीं बल्कि यह है कि इतना जहर उगलने के बाद भी यह कम नहीं हो रहा।

विष तो भगवान शिव ने कंठ में रखकर सृष्टि को विनास से बचाया उन्हें क्या पता था यह विष एक दिन धीरे धीरे जुबान से निलकेगा। हालत यूं हैं कि जहर उगलने के इस दौर में कोई अमृत भी दे दे तो उसे जहर की दृष्टि से ही देखा जाता है। यूं तो समुद्र मंथन से विष निकला हमारे देश मे जब जब पांच साल में लोकतंत्र का मंथन होता है तब तब जमकर जहर निकलता है अफसोस इसे धारण करने वाले लोग उल्टा उसे और भी तेजी से उगलने लगते हैं।

विष तो केवल जनता रूपी शिवशंकर ही धारण करने पर विवश होती है। लेकिन कब तक इसी तरह जहर उगलने का सिलसिला चला तो जनता भी इसे धारण करने की स्थिति में नहीं रहेगी फिर परिणाम और भी गम्भीर आएंगे। वक्त है समझने का जहर उगलने के सिलसिले के थमने का वरना फिर इसकी चपेट में देश का सुनहरा लोकतंत्र ही खतरे में आ जायेगा। जुबान पर संयम की बात हर वेद शास्त्र में लिखी है सिर्फ एक राजनीति ही है जिसकी किसी भी किताब में सम्भवतः यह संयमिता पता नहीं कहाँ उल्लेखित है।

कहावत भी हमारे देश मे खूब हैं कहीं जुबां पर ताला लगने की तो कहीं जुबां की बेबाकी की, कहीं जुबान से शहद टपकने की तो कहीं जुबान से जहर बरसने की फिलहाल न तो शहद का पता है न ही संयम का। जुबानी जहरीले बाण हर घण्टे दो घण्टे में मिसाइल बन कर दागे जा रहे हैं। कोई भी इसमे पीछे नहीं जनता पर इन मिसाइलों का कितना असर होता है यह तो आने वाला वक्त की डिसाइड करेगा तब तक आप स्वयं को बचा कर रखें ना तो जहर पीने से न ही जहर उगलने से।