इसी बहाने : ढाई आखर प्रेम के, तीन अक्षर पर रार, चार का पता नहीं..!

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कटनी। कबीर ने ढाई आखर प्रेम की परिभाषा बताई तब दुनिया ने उसे स्वीकार किया आज ढाई की जगह तीन अक्षर हैं जो फसाद की जड़ बने हैं। इसे लेकर राजनीति के कबीरों की राय अलग-अलग हैं।
खास यह है कि, ढाई आखर प्रेम का पढ़ने वाला पंडित हुआ हो या न, किंतु सरकार के एक के बाद एक जारी तीन अक्षर के पंडितों की भरमार पड़ी है। वैसे अब आपको रार मचाने वाले तीन आखर को बताना जरूरी नहीं, क्योंकि इन तीन अक्षरों को सुबह से शाम तक देखा सुना अथवा पढा जा सकता है। समझ ही गए होंगे इन तीन अक्षरों को। पहले सीएबी फिर सीसीए उसके बाद एनआरसी और अब एनआरपी.. जी हां, बिल्कुल सही समझे आप। ढाई आखर प्रेम पर ये तीनों अक्षर फिलहाल भारी पड़ रहे हैं।

देश फिलहाल इन्ही तीन अक्षरों पर ठिठका है। आलम यह है कि इन तीन अक्षर के कारण देश का माहौल नरम गरम है। इनके कारण महंगाई बेरोजगारी जैसे चार अक्षर भी फिलहाल दुबके बैठे हैं, जिनका कहीं अता पता नहीं।

देश की मंदी को लोग भूल गए, प्याज भी खुश है चाहे 100 रुपये किलो बिके या उससे ज्यादा कोई भी उसे नहीं कोस रहा। कम्पनियों से कर्मचारियों की छंटनी हो या फिर बेरोजगार सड़क पर, सब इस वक्त केवल तीन अक्षरों के पीछे पड़े हैं। सरकार को इन तीन अक्षर का शस्त्र प्राप्त हुआ तो विपक्ष को इन्हीं अक्षरों का अस्त्र मिल चुका है।

मूल मुद्दों से भटके समाज के दिशाहीन लोग भी कहीं इसे लेकर पत्थर उठा रहे हैं तो कहीं इसके समर्थन में मार्च निकाल रहे हैं। यही तो इस देश की खासियत है। यहां कभी किसी फिल्म के नाम को लेकर रार हो जाती है तो कभी किसी बयान को लेकर तकरार छिड़ जाती है। सड़कों पर नाम और बयान का यह युध्द दुनियाभर में अपनी रेटिंग जमा लेता है।

जिनको समझ मे आता है उनकी व्याख्या किसी के पल्ले नहीं पड़ती और जो नहीं समझते हैं उनके तर्क सुनकर कोई भी अपना सिर पकड़ लेता है। ऐसे ही हमारा देश चलता रहता है। बहरहाल तीन अक्षरों पर छिड़ा संग्राम अब औऱ नहीं, आखिर कब तक यह सब कुछ सत्ता के लिए चार अक्षर वाले मूल मुद्दा भटकाने का शस्त्र बना रहेगा, और कब तक विपक्ष के लिए यह मार्चपास्ट का मौका ढूढता रहेगा??

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