BJP को उलझाने की कोशिश में खुद उलझ गई शिवसेना, अब होगा क्या…?

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वेब डेस्क। महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर भाजपा को उलझाने वाली शिवसेना अब खुद अपने बुने जाल में उलझ कर रह गई है। मुख्यमंत्री पद को प्रतिष्ठा का सवाल बनाने वाली शिवसेना अब तय नहीं कर पा रही है कि वह शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी से समर्थन ले या फिर भाजपा के उपमुख्यमंत्री पद के प्रस्ताव को स्वीकार करे।

शिवसेना की मुश्किल यह है कि भाजपा और एनसीपी दोनों दलों ने उसके सामने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। भाजपा उसे किसी भी कीमत पर सीएम का पद नहीं देने तो एनसीपी ने भाजपा से सियासी तलाक के बाद ही शिवसेना को समर्थन देने की शर्त रखी है।

चुनाव परिणाम आने के बाद शिवसेना को लगा था कि वह एनसीपी-कांग्रेस के समर्थन का भय दिखाकर भाजपा से मुख्यमंत्री पद हासिल कर लेगी। इसी के मद्देनजर उसने भाजपा के खिलाफ ताबड़तोड़ हमले किए लेकिन भाजपा ने पहले ही दिन साफ कर दिया था कि वह लंबे समय से अपनी सहयोगी पार्टी शिवसेना को किसी भी हालत में सीएम पद नहीं देगी और वह अब भी अपने इस रुख पर कायम है।

शिवसेना की रणनीति को पहला झटका उस वक्त लगा जब एनसीपी ने समर्थन हासिल करने के लिए उसके सामने एनडीए से नाता तोड़ने की अनिवार्य शर्त रखी। शिवसेना की भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति को भांपते हुए एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी और कांग्रेस सरकार बनाने की प्रक्रिया में तभी दिलचस्पी लेगी जब शिवसेना आधिकारिक तौर पर एनडीए से अलग होने की घोषणा करे। इसके बाद से शिवसेना नेतृत्व भावी रुख अपनाने को लेकर असमंजस में है।

किसी भी कदम से अब छवि पर असर

नई सरकार के गठन को लेकर शिवसेना को अपना रुख साफ करना जरूरी है। उसे यह तय करना होगा कि नई परिस्थिति में वह फिर से भाजपा के साथ रहेगी या फिर एनसीपी-कांग्रेस को सत्ता के लिए नया साथी बनाएगी। मुश्किल यह है कि भाजपा शिवसेना को साथ लाने के लिए कोई सम्मानजनक रास्ता भी नहीं दे रही। भाजपा पर ताबड़तोड़ आक्रमण के बाद उसे ही गले लगाना और उप मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव मान लेने से शिवसेना की किरकिरी होगी, जबकि एनसीपी-कांग्रेस के साथ जाने की स्थिति में उस पर हिंदुत्व की राजनीति को कमजोर करने का आरोप लगेगा।

अगले 48 घंटे बेहद अहम

राज्य में जारी सत्ता संग्राम में अगले 48 घंटे बेहद अहम हैं। राज्य के विधानसभा का कार्यकाल 8 नवंबर को खत्म हो रहा है। ऐसे में शिवसेना के समक्ष रुख साफ करने के लिए अब महज 48 घंटे बचे हैं। जहां तक भाजपा का सवाल है तो शिवसेना और एनसीपी के साथ आने पर सहमति न बनने की स्थिति में पार्टी पिछली बार की तरह अल्पमत सरकार बना सकती है। वैसे भी भाजपा सूबे में किसी भी स्थिति में राष्ट्रपति शासन नहीं लगने देना चाहती।
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