फिलहाल लोक की बारी फिर तंत्र के आगे बेचारी

इसी बहाने(आशीष शुक्‍ला)। लोकतंत्र का महापर्व है, खुशियां बिखरीं हैं। भले ही अब चुनावी उत्सव का नजारा आयोग की बेड़ियां में बधां हुआ सा नजर आता हो। न तो बैनर झंडों के पटा शहर दिखता हो न ही भोंपू की आवाज में माननियों के ज्यादा वादे ही सुनाई देते हों लेकिन बावजूद इस शांतिपूर्वक चुनाव को मन ही मन जनता खूब उत्साहित होती है। हो भी क्यों न आखिर लोकतंत्र के इस महापर्व में कुछ रोज ही तो लोक के होते हैं बाकी समय तो तंत्र ही हावी दिखता है। लोक और तंत्र में लोक लुभावने वादों से लेकर खोषणाओं के पिटारे खुल चुके हैं। किसी को बिना कामधाम पैसे मिलने की उम्मीद जगी है तो कोई देश में राष्ट्रवाद को लेकर किंकर्तव्यविमूढ़ सा दिख रहा है।

विश्वास की कसौटी पर दोनों ही मामले जनता के मन में नये-नये विचार ला रहे हैं। वैसे तो हमारे देश में हर वक्त कहीं न कहीं कोई न कोई चुनावी उत्सव होते रहते हैं। कभी किसी जगह के लोक उत्साहित होते हैं तो कभी कहीं और के लोक को चंद रोज की ही सही खुशी जरूर ही मिलती है। दुनिया में लोकतंत्र के इस महाउत्सव में भारत के महान लोकतंत्र की मिशालें दी जाती हैं और दी भी क्यों न जाएं, आखिर यहीं तो जनता को चुनावों में जो सम्मान प्राप्त होता है दुनिया का कोई भी देश उसका अनुसरण नहीं कर सकता। पांच साल में एक बार ही सही पर बारी तो जनता की भी आती है। जनता ही सरकार बनाती है और जनता ही अपनी सरकार को गद्दी से उतार भी देती है। कई किले ध्वस्त हो जाते हैं तो कई नई इमारतें खड़ी हो जाती हैं।

पांच साल के लिए फिर इन वादों को पूरा होने की आस लगाये फिर लोकशाही नौकरशाही के आश्रित हो जाती है। 7 दशकों से यहीं चलता आया है, पर संतोष यहीं कि देश में चाहे जितने आरोप लगाये जाएं, चाहे जितने अविश्चास बताये जाएं पर खुशी यह देश है इस देश का लोकतंत्र है जो आज भी मतबूत है और आने वाली पीढ़ियों तक मतबूती में दुनिया की मिशाल ही बनता रहेगा। हमारे देश के धैर्यवान मतदाता जो अपने फैसले के इंतजार में पांच साल इंतजार के बाद भी नहीं थके न ही रूके तभी तो आज भी इस महाउत्सव में आहुति देने मतदान केन्द्रों के बाहर लंबी लंबी कतारें लगी हैं, तभी तो आज भी कल तक रूतबा वाले माननीयों की चुनावों के बाद रूसवाई भी तय हो जाती है। समय फिर से चुनाव का है तो फिर से लोक और तंत्र में मत के इस दान को लेने के लिए कई भिक्षुक द्वार पर खड़ा है। मतदाता भी लक्ष्मण रेखा के भीतर से ही दान देने की जिद में अड़ा है। उसे मालूम है लक्ष्मण रेखा पार करते ही परिणाम पांच साल भोगना उसे ही पड़ा है। लोक तो फिलहाल पूरी लोकशाही पर उतर कर खड़ा है।

अब फैसले ही घड़ी भी सामने है जिसने बिना भटके अपने फैसले को ईव्हीएम में उतारा उसके लिए पांच वर्षों तक तंत्र पर भारी लोक होगा और जो भटक गया उसके लिए फिर सिर्फ एक बेचारा लोक ही बन कर रहना मजबूरी होगा। वक्त वादों और दावों का खूब चल पड़ा है। मंदिरों में नवरात्र पर सिर झुकाने वो लोग भी सामने खड़े हैं जो यदा -कदा ही यहां नजर आते हैं। अभी तो सुकून है कि इन माननीयों के नजर आने का वक्त सामने है जितना देखना है देख लो। फिर पता नहीं कब दिखें…। आज के इस वक्त में कवि कुमार विश्वास की यह चार पंक्ति याद आना लाजिमी है….

नदी के घाट पर भी अगर सियासी लोग बस जाए,
तो प्यासे होंठ एक-एक बूंद पानी को तरस जाए।
गनीमत है कि मौसम पर हुकूमत चल नहीं सकती,
नहीं तो सारे बादल इनके खेतों में बरस जाए….’