सिनेमा हॉल का गुजरा जमाना- आज भी नहीं भूले शहरवासी

वो फिर नहीं आते…
जबलपुर प्रतिनिधि। जिंदगी के सफर में गुजर जाते है जो मुकाम वो फिर नहीं आते । यह गीत वर्तमान शहर के सिनेमा जगत के हाल खुद बयां करता है। वो भी एक दौर था जब शहर जबलपुर में टॉकीजों की भरमार हुआ करती थी। पुराने लोग बताते है कि उनके समय 22 सिनेमा हॉल हुआ करते थे ,जो धीरे-धीरे कम होकर खत्म हो गए। फिल्मों की दीवाने भी यहां कम नही थे। राजेश खन्ना,अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना जैसे अभिनेता लोगों के पंसदीदा कलाकार हुआ करते थे और जैसे ही इन अभिनेताओं की फिल्में रूपहले परदे पर लगा करती थी तो फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने का जुनून उन्हें अलसुबह से ही टिकट खरीदने के लिए लाईन में ले जाकर खड़ा कर देता था। पुलिसकर्मियों की मार ,भीड़ से जद्दोजहद के आगे सिनेमा का जुनून हमेशा जीत जाया करता था। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में वर्तमान में ये जुनून खो गया है या यूं कह ले कि चैनलों की अधिकता और मल्टीप्लेक्स और सोशल मीडिया के माध्यम से इतनी अति हो गई है कि लोगों की सिनेमा के प्रति दीवानगी अब पहले जैसी दिखाई नहीं देती या यूं कह ले कि फिल्मों का वह स्वर्णिम दौर अब पुराने पन्नों में दर्ज हो गया है।
सुनाया करते थे कहानी
फिल्मों की दिवानगी इसी से समझी जा सकती है कि यदि कोई शख्स नयी फिल्म देखकर आता था तो मोहल्ले भर के लोग उससे स्टोरी सुना करते थे। कहानी सुनाने का यह क्रम कई हफ्तों चला करता था। अधिकांश लोग तो स्टोरी सुनने के बाद तय किया करते थे कि फिल्म देखी जाए कि नहीं।
पैदल चलकर करते थे मुआयना
सिनेमा देखने वाले लोगों की सहूलियत को इसी से समझा जा सकता है कि वह जब कोई नई फिल्म लगा करती थी तो सबसे पहले ज्योति टॉकीज पहुंचा करते थे और वहां से पैदल घूमकर आसपास के सिनेमा हॉल में चल रहे चलचित्र की जानकारी लेकर तय किया करते थे कि कौन सी पिक्चर देखी जाए।
पोस्टर देखने का जुनून
सिनेमा के उस दौर में लोगों में पोस्टर देखने का जुनून भी शामिल था । पिक्चर भले ही वे ना देख पाए लेकिन पोस्टरों को देखने ही वे सिनेमाहॉल पहुंच जाया करते थे और देर तक पोस्टरों को निहारा करते थे । ज्यादातर यह दृश्य उन सिनेमा हॉल में देखने मिला करते थे जहां अग्रेंजी फिल्में लगा करती थी, जिसका बारीकी से अध्यन करने के बाद वे यह तय किया करते थे कि फलां फिल्म देखने से उनका समय बर्बाद नहीं होगा।
हॉथों से बनाया करते थे पोस्टर
शहर के रंगकर्मी विकी तिवारी बताते है कि फिल्मों के पोस्टर बनाने की शुरूआत शहर में सर्वप्रथम उनके पिता स्व. कृष्ण कुमार तिवारी द्वारा की गई थी। फिल्म रिलीज होने के पहले ही उनके पास फिल्म से संबंधित सारे फोटोग्राफ और अन्य सामग्रियां आ जाया करती थी जिसके आधार पर वह ग्राफ की मदद से पोस्टर बनाया करते थे। इनके बाद शहर में कई पेंटरों ने इस पेशे को अपनाते हुए फिल्मों के पोस्टर बनाने का काम शुरू कर दिया था।
वीसीआर का दौर
फिल्मों की दीवानगी घटने का दौर उस समय से प्रारंभ हुआ जब वीसीआर का जमाना आया शहरवासी अपनी मनपंसद फिल्में घर बैठे ही वीसीआर में देख लिया करते थे। बावजूद इसके फिल्मों की दीवानगी पर कोई खास असर नही पड़ा उस दौर में भी सिनेमा हॉल खचाखच भरे रहते थे।
इंटरनेट ने बदला स्वरूप
इंटरनेट के आ जाने से मीडिया क्षेत्र में कं्राति का सूत्रपात तो हुआ लेकिन सिनेमा की सहज सुलभता ने इसके प्रति दीवानगी को कम करना शुरू कर दिया लोगों ने सिनेमा हॉल की ओर रूख करना बंद कर दिया था जिसके कारण अधिकांश सिनेमा हॉल लगातार हो रहे घाटे के चलते बंद होते गए।
वेबसीरीज का आ गया जमाना
इस दौड़ती भागती दुनिया में समाज का व्यक्तित्व बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है, सिनेमा भी इस दौर से अछूता नहीं रहा है । सोशल मीडिया ने सिनेमा को भी जकड़ लिया क्योंकि आज का युवा सोशल मीडिया में 24 घंटे में से 18 घंटे व्यतीत कर रहा है । इस कारण युवाओं के इस शौक को ध्यान में रखते हुए सिनेमा के सौदागरों ने वेब सीरीज भी शुरू कर दी है।
मॉल कल्चर ने बदला टॉकीज का रूप
शहर के सिनेमा प्रेमियों की संख्या भी खूब रही है। पुराने समय में जहां लोग एक ही दिन में तीन से चार फिल्में देख लिया करते थे, वहीं मॉल कल्चर आने के बाद से सलेक्टेड मूवीज का ट्रेण्ड ही रह गया है। शहर में सिनेमा अब बड़े पर्दे के साथ थ्रीडी और नाईन डी तक पहुंच चुका है। शहर के मॉल्स में 11 पिक्चर हॉल्स में अब सलेक्टेड मूवीज ही रन करवाई जाती है। अब सिटी मॉल्स के अलावा शहर में शारदा टॉकीज व पनागर में नवीन ज्योति ही बचीं है ंजिससे पुरानी यादें संजोयी जा सके।
कुल सिनेमा हॉल की संख्या
ज्योति, कृष्णा, आनंद, शीला,नवनीत, पायल, विनीत, जयंती, पंचशील, डिलाईट, एम्पायर, प्रभु, वंदना, श्याम, सुभाष, शारदा, कल्पना, लक्ष्मी,सावित्री, महावीर,श्री टॉकिज,पनागर में नवीन ज्योति ।