नई अभिलाषाओं का साल

कालचक्र ने आज एक और बरस दर्ज किया। वर्ष 2018 का कालखण्ड सियासी बदलाव के नाम लिख गया। बीते वर्ष की सबसे बड़ी घटना सूबे की सत्ता से भारतीय जनता पार्टी सरकार की विदाई थी। 15 वर्ष के वनवास के बाद राजपथ पर पहुंची कांग्रेस के लिए नया वर्ष नई उम्मीदें लेकर आया है। इसके साथ ही प्रदेश का हर नागरिक नई अभिलाषाओं और नई आकांक्षाओं के साथ कदमताल करने को तैयार है। नर्मदा तीरे बसे जबलपुर को महानगरीय विकास के पंख लगना अभी बाकी है। थोड़ा अतीत में जाएं तो जबलपुर को सत्ता में काबिज भाग्य विधाताओं के भरोसे वो सब हासिल नही हो पाया जिसका वो हकदार था। प्रदेश के दीगर शहरों की तुलना में संस्कारधानी में विकास की डालें यदि सूखी रही तो इसके पीछे कहीं न कहीं जनप्रतिनिधियों में इच्छा शक्ति का अभाव था। यह शहर वैसा बोलता ही नही की दिल्ली तक सुनाई दे। भोपाल में बैठी सरकार के माथे जितना हो सकता था उतना भी इस शहर को नसीब नही हुआ। अब नई सरकार से लोगों को अनगिनत अपेक्षाएं हैं। नए निजाम में जबलपुर की किस्मत में दो मंत्री मिले हैं लिहाजा यह उम्मीद की जा सकती है कि प्रगति के पहिये लगाकर अपना जबलपुर सरपट दौडऩे लगेगा। जाबालिपुरम से जबलपुर तक की यात्रा में इसे संस्कारधानी इसलिए कहा गया क्योंकि यहां की सांस्कृतिक विरासत का समूचे देश मे कोई सानी नही। इस शहर ने कला के क्षेत्र में नायाब हीरों को जन्म दिया है, जिन्होंने देश- दुनियां में जबलपुर की पहचान स्थापित की। विकास की अपार संभावना वाले महाकौशल के इस केंद्र बिंदु को हम कैसा गढऩा चाहते हैं इसके लिए एक निश्चित विजन बनाकर काम करने की जरूरत है। हमे यह समझना होगा कि जबलपुर की सियासत इतनी कमजोर नही की दिल्ली और भोपाल के दरबारों में जी हुजूरी तक सीमित रहे, बल्कि यह करके दिखाना होगा कि यहां का नेतृत्व दिल्ली दरबार के जी हुजूरियों को थामने की ताकत रखता है। बरस 2018 कुछ जख्म देकर भी विदा हुआ, जिनसे हमें सबक लेने की जरूरत है। कांग्रेस के लिए 2018 शुभ रहा तो भाजपा के लिए साल की विदाई आत्ममंथन की वजह बन गई। 15 बरस की सत्ता से विदाई की वजहें तलाशने की कोशिशों के साथ नूतन वर्ष में लोकसभा चुनाव की चुनौतियां भी दहलीज पर दस्तक दे चुकी हैं। तीन राज्यों में मिली हार की हताशा से बाहर निकलकर आम चुनाव के लिए कार्यकर्ताओं को रिचार्ज करना भाजपा के लिए सबसे जरूरी काम है। कांग्रेस भी विधानसभा चुनाव के प्रदर्शन को लोकसभा चुनाव में दोहराने के इरादे के साथ खड़ी है। पूरे प्रदेश के साथ महाकौशल दोनो दलों के लिए अहम है। सूबे के नए मुखिया कमलनाथ और बीजेपी चीफ राकेश सिंह इसी इलाके का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए लोकसभा चुनाव में भी महाकौशल समर का केंद्रबिंदु बनेगा। 2019 में देश की नई सरकार के गठन के बाद इसी साल नवंबर में नगरीय निकाय चुनाव का नगाड़ा बज जाएगा। कुल मिलाकर गुजरे साल की तरह नए साल में भी राजनीति हावी रहेगी। पूरा साल चुनावी तैयारियों में बीतेगा। नए बरस में देखने लायक रहेगा कि सरकार के नए सिपहसालार जनता को तोहफे में क्या देते हैं। अभी तो पिछड़ेपन के अभिशाप से बाहर निकालने वाले रहनुमाओं की जबलपुर को जरूरत है। कौन सा साल ऐसा होगा जब राहत का मरहम लगेगा। सभी को नूतन वर्ष 2019 की शुभकामनाएं।