काहे के ठाकरे और कौन से पटवा?

क्या भाजपा आपने पितृ पुरुषों को भूल गई?
कोई भी दल अपने वैचारिक झुकाव और संस्थापक सदस्यों के श्रम ,समर्पण एवं आहुति से तैयार होता है । हमने सियासी हलकों में एवं राजनैतिक सभाओं में दिए जाने वाले लच्छेदार भाषणों में सिद्धांतों ,आदर्शों और विचारधारा विशेष की वैचारिक क्रांति के पुरौधा पुरुषों की प्रशंसा के पुल बंधते तो ख़ूब सुने हैं ।पर जब ऐसा देखने को मिले की सभी बातें सत्तामद के ख़ुमार में ,जश्न ,जलवे और दिखावे की लफ्फाज़ियाँ थीं तो कैसा लगेगा ! 28 दिसंबर को मध्यप्रदेश भाजपा के दो दिग्गज़ों स्व. कुशाभाऊ ठाकरे जी और स्व. सुंदरलाल पटवा जी की पुण्यतिथि थी , और यह पुण्यतिथियाँ केवल इक्का-दुक्का कार्यकर्ताओं एवं सिपहसलारों द्वारा सोशल साइट्स में मनाई गईं । पार्टी कार्यालयों में या पार्टी के जिम्मेदारों द्वारा न कोई कार्यक्रम रखा गया और ना ही किसी सार्वजनिक या निजी संस्थान में कोई औपचारिक सभा रखी गई ,ना कि कोई गोष्ठियां आयोजित हुईं ।
”नैतिकता के अवमूल्यन का ग़म करने वाले दल के” और “देश धरम की ठेकेदारी का दम भरने वाले वाले दल की” सत्ता क्या गई ,संस्कार भी चले गए ? यह बड़ा सवाल है !
झुकाव होना स्वाभाविक है । किंतु झुकाव के समय दृष्टि धरातल पर जा पड़े और समस्त भ्रांतिया ओझल हो केवल सत्य द्रष्टा होजाये वही त्रुटि रहित मनु स्मृति है।।
दुख तो यही है की भाजपाईयो को भी सत्ता का चस्का लग गया है …अब तो प्रभु राम भी बहुत बाद तब याद आते हैं जब कुर्सी डोलती दिखती है… आश्चर्य की बात तो यह है कि ठोकर लगने के बाद भी भाजपा के नेता एवं कार्यकर्ता अभी तक हार के गम में इस प्रकार डूबे हुए हैं कि अपने भूतपूर्व नेताओं को भी भूल चुके हैं या फिर अपने आप को टाइगर बताने वाले भूतपूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपना जुगाड़ करके निकल गये शिकार में, बाक़ी बचे दिग्गज बंगला छिनने के गम में उदास है, तो कहां याद आये पटवा-ठाकरे !!