दो कमरों में संचालित हो रहे स्कूल, शिक्षा विभाग मौन

जबलपुर नगर प्रतिनिधि। शिक्षा विभाग इस साल नए निजी स्कूलों को मान्यता नहीं दे रहा है। अलबत्ता निजी स्कूल जो पुरानी मान्यता के बिंदुओं पर खरे नहीं उतर रहे उनकी जांच नहीं की जा रही।
नगर में अधिकतर स्कूल किराए के मकानों में और आवश्यक सुविधाओं के बगैर संचालित किए जा रहे हैं। एक-दो कमरे के मकानों में इंग्लिश मीडियम स्कूल शुरू कर दिया जाता है, फिर मान्यता हासिल कर ली जाती है। जबकि बच्चों के लिए खेल का मैदान, प्रशाधन, पार्किंग, कक्षाएं, सांस्कृतिक हॉल, स्टाफ रूम, लाइब्रेरी, खेल के सामान, शैक्षणिक सामग्री, बिजली, पानी, प्रकाश की सुविधा जैसे बुनियादी जरूरतें भी स्कूलों में नहीं होती।

नगर में शिक्षा के नाम पर निजी स्कूलों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। अंग्रेजी व हिंदी माध्यम स्कूलों की बा? आ गई है। पिछले दो-तीन साल तक निजी स्कूलों को शिक्षा विभाग से भी धड़ाधड़ मान्यता दी जाती रही है। आलम यह है नगर में ऐसे निजी स्कूलों की संख्या दर्जन भर से अधिक पहुंच गई है।
शिक्षकीय स्टाफ भी योग्यता के पैमाने पर खरे नहीं होते। दूसरी ओर बच्चों को अच्छी शिक्षा और बेहतर शैक्षणिक वातावरण देने के नाम पर पालकों से मोटी फीस वसूली जाती है। इसके बावजूद शिक्षा विभाग ऐसे स्कूलों को आंख बंद कर मान्यता देता रहा और निजी स्कूल नियम-शर्तों को दरकिनार करते रहे। इन परिस्थितियों में शिक्षा विभाग के अधिकारी के रहमोकरम पर चल रहे हैं। स्कूलों के लिए मान्यता देने पर ब्रेक लगा दिया गया है, लेकिन स्कूलों की पुरानी मान्यता पर चल रही कमियों की जांच नहीं की जा रही है।
बदले हालात में नए स्कूलों की मान्यता के लिए आवेदन की बाढ़ भी थम गई है। पिछले साल शिक्षा विभाग ने इन इंग्लिश मीडियम स्कूलों को हरी झंडी दी थी, वहीं इस साल भी ये स्कूल को मान्यता के नियमों को पूरा नहीं होने के बाद भी बेखौफ चल रहे हैं। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस साल नई मान्यता नहीं दी जा रही है। हालांकि विभाग की शिकायत के बाद भी पड़ताल के बाद ही निर्णय लिए जाने की औपचारिकता की बात अधिकारी कह रहे हैं।
जबकि इन स्कूलों में शिक्षा का स्तर नहीं सुधर रहा है। इस कारण सुदूर ग्राम्य अंचल और सामान्य आय वर्ग के लोग भी अपने बच्चों को निजी स्कूल भेजना पसंद करते हैं। शिक्षा के नाम पर कारोबार करने वाले लोग इसी विवशता का जमकर फायदा उठाते रहे हैं।