गौवंश के सभी मामलों की होगी एक साथ सुनवाई

जबलपुर। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एसके सेठ व जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की युगलपीठ ने गोवंश की दुर्दशा के अलावा गोशालाओं से संबंधित तीनों मामलों की सुनवाई एक साथ करने के निर्देश दिए हैं। ये निर्णय की वजह एक युवति का वह पत्र है जिसमें गोवंश व गोशालाओं के लिए बयान किए गए दर्द को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने जनहित याचिका के रूप में स्वीकार सुनवाई शुरू की थी। अब इसके साथ जबलपुर के वकील सतीश वर्मा की आवारा पशुओं की समस्या व रीवा जिले में मवेशियों के अवैध बाड़ों को लेकर दायर दो अलग-अलग जनहित याचिकाओं के साथ करने के निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई 18 जनवरी को तय की गई है। इनमें से एक युवति का वह पत्र है जिसमें गोवंश व गोशालाओं के लिए बयान किए गए दर्द को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने जनहित याचिका के रूप में ग्रहण की । साउथ सिविल लाइंस निवासी युवती पूर्णिमा शर्मा ने 24 अक्टूबर को मप्र हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधिपति को यह पत्र लिखा था। इसमें कहा गया कि विभिन्न हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशुओं को सडकों पर विचरण करने से रोकने के निर्देश दिए हैं। इसके चलते इन मूक पशुओं पर स्थानीय निकाय के कर्मी क्रूरता करते हैं। विशेषत: गोवंश के पशुओं को पकड़कर जिन कांजीहाउस, गोशालाओं में रखा जाता है, वहां सुविधाएं नहीं हैं। यहां रखे गए मवेशियों की दशा दयनीय है। नगर निगम जबलपुर ने तिलवारा में गोसेवा केंद्र स्थापित किया है। लेकिन यहां भी लगभग 1000 मवेशी हैं। जबकि इनके लिए यह जगह बहुत ही छोटी है। मवेशियों के खाने,पीने, इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। भूख-प्यास व बीमारी के चलते तिलवारा के गोसेवा केंद्र में रोजाना 5 से 10 मवेशी असमय काल के गाल में समा रहे हैं। निगम में इनके लिए डॉक्टर तक नहीं हैं। युवती ने लिखा कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्वयं को इन पशुओं का वैधानिक अभिभावक व संरक्षक माना है। कोर्ट के अनुसार इन मवेशियों को भी मानवोचित खाने-पीने, इलाज की सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। लेकिन इन निर्देशों के पालन में कोताही की जा रही है।