अब हार की समीक्षा में लगी भाजपा ,प्रत्याशी भी

जबलपुर,यभाप्र। जिले को भाजपा का गढ़ कहा जाता है, लेकिन विधानसभा चुनाव में इस बार भाजपा को अपने ही किले में करारी हार झेलनी पड़ी है। जिले की आठ सीटों में से पार्टी को इस बार 4 सीटों से संतोष करना पड़ा। जबकि कांग्रेस ने इस किले में सेंध लगाते हुए सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली उत्तर मध्य से मंत्री शरद जैन को ही हरा दिया। यहां से विनय सक्सेना जीते। इसके अलावा पूर्व को भी भाजपा का अभेद्य किला माना जाता था यहां से पूर्व मंत्री अंचल सोनकर को कांग्रेस के कद्दावर नेता माने जाने वाले लखन घनघोरिया ने भारी मतों के अंतर से पटकनी दी। जबकि बरगी में कांग्रेस प्रत्याशी संजय यादव ने पिछडऩे के बाद भी अंतिम चक्रों में शानदार वापसी करते हुए लगातार अजेय रहने वाली प्रतिभा सिंह को शिकस्त दी। पश्चिम में कांग्रेस के तरुण भनोत ने अपना कब्जा बरकरार रखा। यहां पूर्व हरेन्द्रजीत सिंह बब्बू पर भाजपा ने भरोसा जताया पर मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया। केन्ट से अशोक रोहाणी,पनागर से सुशील तिवारी इंदू, सिहोरा से नंदनी मरावी ने अपनी सीट बचाए रखी जबकि पाटन से पूर्व मंत्री अजय विश्रोई ने शानदार वापसी करते हुए कांगे्रस के नीलेश अवस्थी को पराजित कर पार्टी को कुछ हद तक संतोष प्रदान किया। खासबात यह है कि भाजपा के जो विधायक हार गए और हार का अंतर भी काफी बड़ा रहा। अब सभी प्रत्याशी तो अपनी हार की समीक्षा कर रहे हैं और कारणों को तलाश रहे हैं। साथ ही भाजपा संगठन भी अपनी कमियों की समीक्षा कर रहा है। पार्टी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि जल्द ही पार्टी का हाईकमान जिला संगठन के पदाधिकारियों पर गाज गिरा सकता है। उल्लेखनीय है कि भाजपा हमेशा अपने कार्यकर्ताओं व संगठन को मजबूत बताती रही है और विधानसभा चुनाव की एक साल पहले से तैयारी करती रही, लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। परिणाम आने के बाद सभी प्रत्याशी अब अपनी हार की समीक्षा कर रहे हैं कि उनसे ऐसा क्या हुआ कि उन्हें हार झेलनी पड़ी । एक को इसी बात को लेकर परेशान है कि उन्हें इतनी बड़ी हार क्यों झेलनी पड़ी। कई्र क्षेत्रों में भाजपा के पदाधिकारी व कार्यकर्ता ही पार्टी से नाराज चल रहे थे। बीच-बीच में उनकी नाराजगी सामने आती भी रही, लेकिन पार्टी के पदाधिकारी उनकी नाराजगी को दबाते रहे। इस वजह से विधानसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं ने पार्टी के विरोध में काम नहीं किया तो हित में भी काम नहीं किया। कार्यकर्ता तटस्थ हो गए। कार्यकर्ताओं में नाराजगी संगठन में उचित स्थान न मिलने, नेताओं व विधायकों द्वारा उनकी बात न सुनना व काम न करना रहा। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है एक विधानसभा सीट पर प्रत्याशी ने चुनाव लड़ा। कार्यकर्ता तो निर्र्दलीय के साथ ही नजर आए।
तकरीबन हर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के प्रत्याशियों का विरोध संगठन के ही शीर्ष नेताओं से लेकर स्थानीय नेताओं ने किया। जिसका खामियाजा कुछ प्रत्याशियों को उठाना पड़ा। खासबात यह रही कि कई नेताओं व पदाधिकारी ने अपने प्रत्याशियों के खिलाफ काम किया। साथ ही विरोध करने के बाद वे दूसरी विधानसभाओं में काम करने के लिए चले गए। कई नेता तो पार्टी के विरोध में मतदान से एक दिन पहले रात में काम करते नजर आए। उन्हें भी दूसरे दल के नेताओं ने काम करते हुए पकड़ा और शहर में चर्चा की विषय बन गया।
यह हो सकता है आगामी दिनों में
चुनाव के दौरान रणनीति बनाने व कार्यकर्ताओं से काम लेने में भाजपा का जिला संगठन अक्षम रहा है। इस वजह से भाजपा को चुनाव हारना पड़ा। इसलिए पार्टी के सूत्रों का कहना है कि आगामी दिनों में जिले के संगठन के पदाधिकारियों पर गाज गिर सकती है और कार्यकारिणी भंग हो सकती है।