&कैदियों की बदल रही है जिंदगी

जबलपुर ,नगर प्रतिनिधि। रोज की सुबह होती है जेल में ही, लेकिन उसके बाद का समय जेल के बाहर की सड़कों पर जिंदगी को संवारने पर ही गुजरता है। शाम को जब घर लौटते हैं तो परिवार और बच्चों के बीच होते हैं और उस सबके बीच सबसे बड़ा सुकून खुद मेहनत कर कमाए रुपए देते हैं। राजकुमार, अशोक पार्टनरशिप में बड़ापाव का ठेला लगाते हैं। नरेंद्र वेल्डिंग का काम करता है। वीरेंद्र सिलाई का काम करता है। योगेश सब्जी का ठेला लगाता है, जबकि संजीव फुल्की (पानी पुरी) का ठेला लगाता है। इन कैदियों की पत्नियों को अगरबत्ती, मोमबत्ती, पापड़, सिलाई समेत अन्य रोजगार देने का विचार किया जा रहा है जिसे जल्द ही शुरू किया जाएगा। जेल अधीक्षक गोपाल ताम्रकार ने बताया कि लंबे समय से जेल में बंद कैदी को सामाजिक जीवन में दोबारा लौटने और उसे रोजगार के साधन उपलब्ध कराने के लिए यह पहल की गई है।खुली जेल में शुरुआत में 6 कैदी अपने परिवार के साथ रहे हैं। यह सभी हत्या में 14 साल की सजा काट रहे हैं। अब सजा सिर्फ 2 साल बची है, इसलिए सभी को यह मौका दिया गया है। इनके बच्चे निजी स्कूलों में पढऩे जाते हैं, ताकि पिता को सामाजिक के साथ-साथ आर्थिक दायित्व का भी पता चल सके। खुली जेल में 10 घर बनाए गए हैं। हालांकि अभी यहां 6 कैदी ही रह रहे हैं। चार अन्य कैदियों को ट्रांसफर किया जाना है। कैदियों और उनके परिजन को 19 अक्टूबर से खुली जेल में ट्रांसफर किया गया है।हत्या के मामले में सजा काट रहे भोपाल निवासी राजकुमार, उज्जैन निवासी अशोक, योगेश, होशंगाबाद निवासी नरेंद्र, संजीव सोलंकी और बड़वानी निवासी वीरेंद्र का अच्छा आचरण देखते हुए खुली जेल में भेजा गया है।