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लोकसभा चुनाव से पहले BJP सांसदों में मची मैदान छोड़ने की होड़, क्या ये है हार का डर?

मंथन । लोकसभा चुनाव से पहले BJP सांसदों में मची मैदान छोड़ने की होड़, क्या ये है हार का डर? सांसदों का सियासी मैदान छोड़ने के पीछे बड़ी वजह क्या वाकई में खुद की मंशा या पार्टी का आदेश भर है या फिर वाकई में मोदी लहर का कम होता वो असर जिसमें 2014 में कई नेताओं की नैया पार लग गई थी।

लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी नेताओं में चुनाव मैदान छोड़ने की होड़ मच गई है. सुषमा स्वराज और उमा भारती जैसे दिग्गज नेता औपचारिक रूप से चुनाव ना लड़ने का ऐलान कर चुके हैं. कुछ सांसदों ने पहले ही विधानसभा की राह पकड़ ली है. बीजेपी नेताओं का मैदान छोड़ना क्या वाकई में पार्टी की मंशा का नतीजा है या फिर मोदी लहर का कम होता असर जिसमें हार की आशंका भी शामिल हैं।

पहले विदिशा से सांसद सुषमा स्वराज और फिर झांसी से सांसद उमा भारती ने राजनीति से रेस्ट के लिए स्वास्थ्य कारणों का हवाला भले दिया हो. लेकिन राजनीति में रास्ता इतनी आसानी से छोड़ा जाता तो फिर कोई चाणक्य, चाणक्य क्यों होता. सिर्फ उमा भारती और सुषमा स्वराज ही क्यों संसद की राह छोड़ने वाले सांसदों की फेहरिस्त एमपी में इससे भी ज्यादा बड़ी है. इन नेताओं को संसद के बजाए विधानसभा में बैठना ज्यादा मुनासिब लग रहा है।

मुरैना सांसद अनूप मिश्रा ने विधानसभा का चुनाव लड़ा, खजुराहो सांसद नागेंद्र सिंह ने भी विधानसभा चुनाव की राह पकड़ी. देवास सांसद मनोहर ऊंटवाल ने भी विधानसभा चुनाव लड़ा. सागर सांसद लक्ष्मीनारायण यादव के बेटे को टिकट मिलने के बाद अब उनके चुनाव लड़ने की संभावना नहीं है।

इनके अलावा कई और सांसद ऐसे रहे जिन्होंने विधानसभा का टिकट पाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया. ये और बात है कि उन्हें टिकट नहीं मिला. भिंड से सांसद भागीरथ प्रसाद भी उनमें से एक हैं. भोपाल सांसद आलोक संजर भी इसी फेहरिस्त में थे. बीजेपी इसे पार्टी की रणनीति के साथ जोड़कर बता रही है वहीं कांग्रेस हार के डर से मैदान छोड़ने वाले नेताओं की संख्या गिना रही है।

सांसदों का सियासी मैदान छोड़ने के पीछे बड़ी वजह क्या वाकई में खुद की मंशा या पार्टी का आदेश भर है या फिर वाकई में मोदी लहर का कम होता वो असर जिसमें 2014 में कई नेताओं की नैया पार लग गई थी. इस बार खुद के साथ पार्टी को भी उनके जीत की संभावनाओं पर शंका है।

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