प्रत्याशी हारे तो पार्षदों की खैर नहीं

जबलपुर, नगर प्रतिनिधि । विधानसभा चुनाव में मतदान के बाद अब जहां परिणाम आने की उल्टी गिनती शुरू हो गई है, वहीं उम्मीदवारों के साथ क्षेत्रीय पार्षदों की धड़कनें भी बढऩे लगी हैं, क्योंकि उम्मीदवारों की किस्मत के साथ उनकी पार्षदी भी दांव पर लग गई है। भाजपा-कांग्रेस पार्षदों को यह डर सताने लगा है कि यदि उनके वार्ड से पार्टी प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा तो अगले निगम चुनाव में उसकी टिकट खतरे में पढ़ सकती है। शहर में 79 वार्ड हैं। इसमें 43 वार्डों में भाजपा और 31 वार्डों में कांग्रेस के पार्षद हैं। 3 निर्दलीय और 2 शिवसेना के पार्षद हैं। विधानसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस के पार्षदों ने भी जमकर मेहनत की। उनकी सक्रियता और मेहनत कितनी कारगर रही अब यह तो विधानसभा का रिजल्ट ही बताएगा। क्योंकि वार्ड का मतदाता जो सड़क-पानी, बिजली और कचरा-गंदगी जैसी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा है उसने अपने पार्षद और उसकी पार्टी पर कितना विश्वास जताया, यह उसी दिन पता चलना है। इसके साथ ही अगले साल होने वाले पार्षदी के चुनाव का भविष्य भी तय हो जाएगा।
प्रत्याशी के बराबर की मेहनत
जिन वार्डों में पार्टी की स्थिति कमजोर थी वहां पार्षदों ने दिन-रात मेहनत की। यहां तक कि विधानसभा उम्मीदवार ने जितनी मेहनत पूरे क्षेत्र में की होगी उससे कहीं ज्यादा जोर पार्षद ने पार्टी को जिताने के लिए अपने वार्ड में लगा दिया। सुबह से लेकर देर रात तक पार्षद वार्ड के मतदाताओं को पार्टी के प्रति रिझाने में लगा रहा।
पिछले चुनावों में भुगत चुके खामियाजा
लोकसभा और विधानसभा चुनाव में वार्ड हारने का खामियाजा पूर्व में भी कई पार्षद भुगत चुके हैं। इतना ही नहीं हार से नाराज पार्टी पार्षद और एमआईसी सदस्यों तक की टिकट काटने में परहेज नहीं करती है। पिछले नगर निगम चुनाव में ऐसे उदाहरण देखने मिल चुके हैं।