मतदाताओं का बदला मिजाज राजनीतिक दलों की धड़कनें बढ़ा रहा

कहीं यह तूफान के पहले की शांति तो नहीं
जबलपुर,यभाप्र। मतदाताओं का बदला मिजाज राजनीतिक दलों की धड़कनें बढ़ा रहा है। पार्टियोंं प्रचार में पूरी ताकत झौंंकी हैं, लेकिन मतदान के बढ़े प्रतिशत और मतदाताओं के मौन ने उनकी नींद हराम कर दी हैं। जानकारों का कहना है कि कहीं यह तूफान के पहले की शांति तो नहीं है। अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर नए मप्र में अब तक की ऐतिहासिक वोटिंग करके मतदाताओं ने अपनी ताकत दिखा दी। दिन भर उतार-चढ़ाव और दोपहर के समय धीमी गति से वोटिंग के बाद जैसे ही दिन ढला, वोटर ऐसे एक्टिव हुए कि मप्र को 75 फीसदी वोटिंग के शिखर तक पहुंचा दिया। हालांकि वोट बढऩे के कारणों ने चुनावी विश्लेषकों को असमंजस में डाल दिया। विश्लेषकों ने पिछली बार मतदान बढऩे के पीछे नरेंद्र मोदी लहर का बड़ा फैक्टर बताया था। साथ ही वजह को भी पुरजोर तरीके से रखा था कि मप्र के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मोदी को पीएम इन वेटिंग घोषित किया गया था, जिसके कारण वोट बढ़े। केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ माहौल भी था, जिसने वोटरों को बाहर निकाला। पांच साल बाद फिर मप्र में लगभग उतने ही वोट बढ़ गए हैं। लेकिन इस बार विश्लेषकों के पास कोई ठोस तर्क नहीं है। वे मानते हैं कि न चुनावी लहर है और न मुद्दों की हवा, फिर भी महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों ने मौन रहकर जमकर वोटिंग करके गफलत में डाल दिया है। ज्यादातर सीटों पर जीत-हार का दारोमदार उम्मीदवार की छवि पर आकर टिक गया है। निष्ठावान कार्यकर्ता और नेता तो अपनी-अपनी पार्टियों के लिए जमीन पर डिजिटल मीडिया तक जी-जान से जुटे रहे। हर उम्मीदवार की सामाजिक और कामकाज की कुंडली मोबाइल फोनों पर घर घर घूम रही थी। फेसबुक, व्हाट्सएप ग्रुप के जरिये तमाम उम्मीदवारों के पिछले कामकाज, बयानों, जातीय समीकरणों और दूसरी पार्टी के नेताओं के साथ रिश्तों को खूब तूल दिया जा रहा था। यह किसी भी पार्टी से नहीं जुड़े वोटरों का रुख तय करने का काम कर रहा था पर वोटर मौन रहा। मतदाता रैलियों और भाषणों से ज्यादा प्रभावित नहीं दिखे है। नेताओं को नारेबाजी व तालियां भी जोर देकर बजवानी पड़ रही हैं। बड़े नेताओं के अभियान से मतदाताओं के प्रभावित न होने से उनकी हवाइयां उड़ी हुई है। मतदाता खुलकर कुछ नहीं कह रहा है। उनके इस रवैये ने पार्टियों के समीकरण को गड़बड़ा दिया है।
करते रहे जीत-हार के समीकरण फिट
लोकतंत्र के माई-बाप मतदाताओं ने किसे चुना और किसे नकारा यह तो मतगणना से पहले पता नहीं चलेगा, लेकिन प्रत्याशी और उनके समर्थक जरूर बुधवार को दिन भर मतदाताओं की सूरत और घटते-बढ़ते प्रतिशत के बीच जीत-हार के समीकरण फिट करते रहे। वोट डालने जाते और वोटिंग से वापस आते मतदाताओं के हाव-भाव से प्रत्याशियों के एजेंट इस बात का अंदाजा लगाते रहे कि उनके खाते में कितने वोट गए। सब के सब बढ़े हुए मतदान प्रतिशत को अपने हक में बढऩा मानने के पीछे के समीकरण फिट करते रहे। दिन भर की भागदौड़ के बाद रात में जैसे-जैसे सत्ताधारी दल के नेताओं को मतदान प्रतिशत में इजाफे की जानकारी होती गई,उनके दिल की धड़कनें तेज हो गईं।

जीत-हार कम वोटों से होगी
बढ़े हुए मतदान प्रतिशत भले ही भाजपाई बदलाव का संकेत नहीं मान रहे हैं, लेकिन एक बात दबी जुवान से यह जरूर कह रहे हैं कि इस बार जीत-हार का अंतर बहुत कम होगा। इसके पीछे वह इस बार कांग्रेस की अधिक सक्रियता को मान रहे हैं।
एजेंटों ने पक्ष में दी रिपोर्ट
खास बात यह है कि इस बार चुनाव में पार्टियों के पोलिंग बूथ पर बैठने वाले एजेंटों ने अपने-अपने प्रत्याशियों को पॉजिटिव रिपोर्ट दी है। खासकर भाजपाई पोलिंग एजेंटों ने जो रिपोर्ट प्रत्याशियों को दी है,उसमें सब कुछ बेहतर बताया है।
बढ़ा हुआ मतदान आशीर्वाद या आक्रोश
बड़ा सवाल यह है कि यह बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत शिवराज सरकार की योजनाओं पर जनता का आशीर्वाद माना जाए या बदलाव के लिए आक्रोश? इस मामले में दोनों दलों के नेता दिल को समझाने अपना-अपना गणित और समीकरण लगा रहे हैं। भाजपाई नेता यह मानकर चल रहे हैं कि संबल योजना, तीर्थदर्शन सहित किसानों के लाभ के लिए बनाई गई योजनाओं पर जनता ने बढ़-चढ़कर आशीर्वाद दिया है। वहीं कांग्रेसी इसे बदलाव का संकेत मान रहे हैं।