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राजस्थान के रण में ‘अकेली’ वसुंधरा के सामने दोहरी चुनौती !

राजस्‍थान चुनाव डेस्‍क। 2019 के लोकसभा चुनाव की तो अभी कह नहीं सकते, लेकिन राजस्थान के चुनाव में मंदिर बड़ा मुद्दा बनकर उभरता हुआ नहीं दिख रहा. भारतीय जनता पार्टी राजस्थान के चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों के साथ जनता के लाभ वाली 100 योजनाओं को ही मुद्दा बना रही है. वहीं, कांग्रेस स्थानीय मुद्दों में सड़क, बिजली, पानी और वसुंधरा सरकार के प्रति लोगों के गुस्से को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा मान रही है. स्थानीय स्तर पर दिए गए नारे- ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं’ को कांग्रेस फिलहाल और हवा दे रही है. चुनावी राजनीति के केंद्र में वसुंधरा हैं और उनके सामने चुनौतियां दोहरी हैं. एकतरफ उन्हें विरोधियों से निपटना है, तो दूसरी तरफ दिल्ली के ‘कमजोर सहयोग’ से भी पार पाना है।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि केन्द्र में बैठी बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व भी नहीं चाहता है कि राम मंदिर मुद्दा राजस्थान और मध्य प्रदेश के चुनावों में इस्तेमाल हो जाए, क्योंकि अगर ये मुद्दा अभी इस्तेमाल हो गया, तो इतनी जल्दी लोकसभा चुनावों में इसका दोबारा इस्तेमाल मुश्किल होगा. जिस तरह के हालात देश में बन रहे हैं बिना राम मंदिर जैसे किसी इमोशल इश्यू के बीजेपी की वापसी की राह इतनी आसान नहीं दिख रही है. ये अनुमान यूं हीं नहीं हैं. इसके पीछे ठोस तर्क भी है।

दरअसल, बीजेपी ने शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के अयोध्या जाने के बाद से बने मुद्दे को 25 नवंबर को ही शांत होने दिया. यानी मध्य प्रदेश चुनाव से करीब तीन दिन और राजस्थान चुनाव से 10 दिन पहले. अगर संघ और बीजेपी चाहती, तो आसानी से इस मुद्दे को 6 दिसंबर तक जिंदा रखा जा सकता था. हालांकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और इन दिनों बीजेपी की राजनीति के सबसे बड़े हिन्दू चेहरा माने जा रहे योगी आदित्यनाथ अली और बजरंग बली के बयान के बहाने राजस्थान में हिन्दू-मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की है. लेकिन राजस्थान में धार्मिक ध्रुवीकरण एक मुश्किल काम है. राजस्थान की राजनीति पर करीबी नजर रखने वाले कुछ लोगों का मानना है कि बीजेपी का केन्द्रीय नेतृत्व कभी भी वसुंधरा को उस हद तक जाकर समर्थन नहीं करेगा, जिस स्तर पर वह और प्रदेशों के चुनावों में करता रहा है.

यही वजह है कि बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह उस शिद्दत के साथ राजस्थान चुनावों में नहीं लगे हैं, जिस शिद्दत के साथ लगकर उन्होंने गुजरात जीता था. इसका सबसे बड़ा कारण है वसुंधरा और केन्द्रीय नेतृत्व के बीच लगातार बनी हुई दूरी. नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री और अमित शाह के बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद से ही जयपुर और दिल्ली में रिश्ते ठीक नहीं रहे हैं और कई बार इन रिश्तों की कड़वाहट मीडिया में भी आई.

बात करें बीजेपी की, तो पार्टी के भीतर अध्यक्ष अमित शाह एकक्षत्र नेता हैं. कभी भी किसी ने उनके फैसला का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटाई, लेकिन जिस तरह राजस्थान चुनावों में टिकट बंटवारे में वसुंधरा खेमा भारी रहा, उसके बाद से सब कुछ ठीक नहीं दिख रहा है.

प्रधानमंत्री को छोड़ दें, तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही वो बड़े चेहरे हैं, जो राजस्थान में लगातार चुनावी सभाएं कर रहे हैं. लेकिन ये दोनों नेता केन्द्रीय नेतृत्व के कहने पर आ रहे हैं या वसुंधरा से निजी रिश्तों का कारण इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. चुनाव में बड़े नेताओं के कम दौरे लगने के सवाल पर बीजेपी के स्थानीय नेताओं का कहना है कि राजस्थान में बाहरी मतदाता गुजरात और महाराष्ट्र की तुलना में बहुत कम हैं, ऐसे में यहां बाहरी नेताओं की जरूरत ही कम है और राज्य ईकाई ने केन्द्रीय मंत्रियों की मांग भी नहीं की है.

ये तर्क इसलिए भी गले नहीं उतरते क्योंकि हाल के वर्षों में बीजेपी का प्रचार तंत्र जिस भव्यता के साथ संचालित होता है, उसमें ‘राजनीतिक सितारों’ की अहम भूमिका होती है. और ये ‘राजनीतिक सितारे’ दिल्ली से ही चुनावी रणक्षेत्रों में पहुंचते हैं. मोदी-शाह चेहरे के तौर पर तो कई सारे सहायक की भूमिका में या फिर पर्दे के पीछे से हाथ बंटाते हैं. लेकिन राजस्थान में अगर बीजेपी की ये परंपरा टूटती दिख रही है, तो सवाल इसी वजह से हैं.

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