हिमाचल में बंदर बने चुनावी मुद्दा, नसबंदी के बाद भी नहीं घटी आबादी

Advertisements

शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों में बंदरों का मुद्दा गरमाया है।किसानों और शहरों में रह रहे लोगों को बंदरों की समस्या से निजाद दिलाने के लिए प्रदेश सरकार की योजना का फायदा बंदर पकड़ने वालों को ही हुआ है। तीन साल में सरकार ने बंदर पकड़ने पर 3.5 करोड़ रुपये से अधिक की रकम खर्च कर दी है, लेकिन बंदरों का आतंक बरकरार है।

बंदरों को पकड़ कई मंकी कैचर लखपति बन गए, लेकिन किसानों की फसल और शहरों के लोग दोनों ही अब भी बंदरों से सुरक्षित नहीं हैं। प्रदेश सरकार ने बंदरों को मारने के आदेश भी जारी किए, लेकिन सरकार ने एक भी बंदर नहीं मारा।

यही नहीं सरकार ने बंदरों को मारने के लिए इनामी राशि भी घोषित की थी, जिसका भी कोई असर नहीं हुआ। हिमाचल की किसान सभा ने इस मसले पर निर्णायक लड़ाई छेड़ने का फैसला किया है।

प्रदेश में वर्ष 2015 में बंदरों की गणना की गई थी। उस समय हिमाचल में बंदरों की संख्या 2,07,614 थी। तीन साल में सरकार ने 57,934 बंदरों की नसबंदी की। इस अवधि में कुल 61,436 बंदर पकड़े गए और मंकी कैचर्स को तीन करोड़ 25 लाख 56 हजार 928 रुपये दिए गए।

नसबंदी के बाद भी बंदरों की भरमार

प्रदेश सरकार दावा कर रही है कि अभी तक एक लाख 25 हजार 266 नर और मादा बंदरों की नसबंदी की जा चुकी है। 2015 के दौरान की गई बंदरों की गणना के मुताबिक प्रदेश में करीब दो लाख सात हजार 615 बंदर हैं। आंकड़ों के मुताबिक बंदरों की नई पौध कम नजर आनी चाहिए, लेकिन शहरों में बंदरों की टोलियों में नवजात बच्चे दिखाई दे रहे हैं, जो नसबंदी योजना पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

Advertisements