15 बरस का वनवास से भी दूर नहीं हुई कांग्रेस नेताओं में गुटबाजी, टिकट की बात आते ही एकता के गुब्बारे की हवा निकली

भोपाल। सत्ता की मलाई से दूर 15 बरस का वनवास भी कांग्रेस नेताओं में गुटबाजी दूर नहीं कर पाया। केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच हुए विवाद ने एकता के तमाम दावों को एकबार फिर सतह पर ला दिया है।

वैसे भी दोनों के बीच दूरियां सालों पुरानी हैं। दोनों के बीच अदावत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की समन्वय यात्रा सिंधिया का प्रभाव क्षेत्र वाले जिलों में अभी तक नहीं हो पाई है।

2008 का विधानसभा चुनाव हो या फिर 2013 का, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच दूरियां कभी कम नहीं हो पाईं। पार्टी के प्रभारी महासचिवों ने मध्यप्रदेश में कई मर्तबा गुटों में बंटी कांग्रेस को एक करने की कोशिश भी की पर हर बार नाकामयाबी ही हाथ लगी।

हर चुनाव से पहले सभी नेता गुटीय राजनीति को दरकिनार कर पार्टी को जिताने की कसमें तो खाते हैं पर टिकट वितरण का समय नजदीक आते-आते तक स्थितियां हाथ से निकल जाती हैं। इस बार भी शुरुआती दौर में स्थिति परंपरागत ही नजर आई पर टिकट की बात आते ही एकता के गुब्बारे की हवा निकलने लगी। अपने चहेतों को टिकट दिलाने के लिए सभी नेता ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। इससे मतभेद भी गहराते जा रहे हैं।

जानकारों की मानें तो दिग्विजय और सिंधिया परिवार के बीच राजनीतिक रिश्ते कभी सहज नहीं रहे। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता दिवंगत माधवराव सिंधिया से भी दिग्विजय सिंह की कभी पटरी नहीं बैठी। गुटीय राजनीति इस कदर हावी रही कि दोनों ने अपने-अपने लोगों को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

जब माधवराव सिंधिया का निधन हुआ तो बर्फ कुछ पिघलती नजर आई। दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के चुनाव में उनका साथ दिया। वे भी मुख्यमंत्री निवास पर आने-जाने लगे पर 2008 के विधानसभा में फिर टिकट को लेकर दूरियां बढ़ने लगीं, जो 2013 के विधानसभा चुनाव तक बरकरार रही। तब चुनाव में सिंधिया को कांग्रेस का चेहरा बनाने के प्रयास भी हुए।

केंद्रीय नेतृत्व का रुख भी सकारात्मक था पर सिंह इसके लिए राजी नहीं थे। यही वजह है कि उन्हें चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाकर आगे तो किया गया पर टिकटों में गुटबाजी हावी रही और नतीजा पार्टी के खिलाफ रहा।

इस बार भी जब ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह के राघौगढ़ स्थित घर पहुंचे तो यह संदेश दिया गया कि दोनों के बीच रिश्ते सामान्य हो रहे हैं पर टिकट वितरण में जिस तरह दोनों नेताओं के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं, उससे कांग्रेस में एकता के दावों पर सवाल जरूर खड़े हो गए हैं।

विवाद के पीछे इंदौर की सीटें

दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच हुए विवाद के पीछे मालवा की सीटें देखी जा रही हैं। इनमें उज्जैन, इंदौर क्रमांक 1, 2, 3 एवं देपालपुर सीट का टिकट विवाद भी है। इसके अलावा व्यापमं के आरोपी गुलाब सिंह किरार को पार्टी में प्रवेश कराने का मामला भी है, जिसमें पार्टी को पीछे हटना पड़ा।

इंदौर 1 में संजय शुक्ला, कमलेश खंडेलवाल, इंदौर 2 पर मोहन सेंगर व चिंटू चौकसे, इंदौर-3 में अश्विनी एवं पिंटू जोशी, देपालपुर में सत्यनारायण पटेल व विशाल पटेल के बीच किसी एक का नाम तय होना है। उज्जैन नगर की सीट पर दावेदारों में राजेंद्र भारती और माया त्रिवेदी के बीच खींचतान चल रही है। इन सीटों पर चर्चा के दौरान ही दोनों के बीच तीखी नोंक-झोंक हो गई।

दिग्गी ने टि्वटर पर दी सफाई

उधर, दिग्विजय सिंह ने ट्वीट कर स्पष्ट किया है कि प्रेस में यह बात गलत ढंग से पेश की जा रही है कि मेरे और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच किसी तरह का विवाद हुआ है। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को हस्तक्षेप करना पड़ा, यह बात सही नहीं है। उन्होंने कहा कि हम सब एक हैं और मप्र में भ्रष्ट भाजपा सरकार को शिकस्त देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।