इसी बहाने: उपेक्षित कार्यकर्ता के अपेक्षित बनने का वक्त

म कार्यकर्ताओं की बल्ले -बल्ले का समय चल निकला है। कहावत याद आने लगी है चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात। हालांकि यह चांदनी फिलहाल चार दिन की नहीं बल्कि 40-45 दिन की है। हमेशा उपेक्षित रहने वाला कार्यकर्ता आज अचानक ही अपेक्षित बन गया है। फिर विज्ञप्तियों में कार्यकार्ताओं के नामों को तरजीह मिलने लगी है, फिर वरिष्ठता पहचान बनाने लगी है। खैर राजनीति का यह भी एक अंग है। बेचारे कार्यकर्ता का क्या दोष उसे तो हर बार सिर्फ एक वही है खेवनहार का सब्जबाग जो दिखाया जाता है। ऐसे कुछ जो माननीयों के साथ सिर्फ इस वक्त ही नजर आते हैं फिर तो पूरे पांच साल ये कुछ कहीं खो जाते हैं और फिर खूब सारों की नई जमात साथ होती है। आम और कर्मठ के कंधे पर माननीयों का हाथ ऐसा महसूस होता है जैसे मानों यह सहारा नहीं बल्कि पूरे पांच वर्ष का भरोसा है। वह भरोसा जिसकी उम्मीद कभी हाथ में झंडा तो कभी कार्यालयों की दरी फट्टी उठा कर उसने एक न एक दिन अपने भी महत्व मिलने के सपने में देखी थी, लेकिन इन 40-45 दिनों के सफर के बाद उसे पांच वर्ष इंतजार ही रहता है कि फिर कोई आएगा, फिर उसकी महत्वाकांक्षा को समझेगा, फिर उसे वही अपनापन महसूस कराएगा जिसकी उसे हर क्षण जरूरत रहती है। पर फिर वह यही देख पाता है कि नए कार्यकर्ता जुड़े हैं, साथ चल रहे हैं, हर पल अपने को सक्रिय बताने की होड़ लगा रहे हैं, अपेक्षाओं को पूरी तरह से भुना रहे हैं। सिर्फ जनता ही नहीं हर पांच साल में कार्यकर्ता भी आश्वासनों के मकडज़ाल में उलझा हुआ नजर आता है। खास बात यह कि सब कुछ मालूम होने के बाद भी उसे अपेक्षित होने के साथ ही सदियों की उपेक्षा से कोई गिला शिकवा नहीं। सदियों से यही चला आ रहा है। यहां कई इमारतें उन कार्यकर्ता रूपी मजबूत ईंट पर खड़ी हैं जिनका जिक्र यदा कदा या यूं कहें सिर्फ पांच सालों में ही एक बार होता है। बहरहाल होता तो है। भगवान करे इसी तरह होता ही रहे। आज नहीं तो कल दिन सुधरेंगे या यूं कहें अच्छे दिन भी आएंगे। भले ही वह आचार संहिता की घोषणा के वक्त ही क्यों न आएं। आते हैं कभी कभी ये दिन भी आते हैं जब उपेक्षित लोग भी अपेक्षित बन जाते हैं। गलती तो उन कार्यकर्ताओं की ही है जो उम्मीद से अधिक अपेक्षा पाल लेते हैं। माननीय भी इस उपेक्षा पर अपेक्षा का ऐसा मरहम लगाते हैं कि जख्म अगले पांच वर्ष तक कभी कभार ही दर्द देते हैं। फिलहाल तो सड़क पर रुकने वाले वाहन अचानक ही पैदल चलते कार्यकर्ता के बगल में आकर ठहर जाते हैं। मोबाइल पर यूनिक से दिखने वाले नम्बरों से फोन आ जाते हैं । सुबह सुबह दरवाजा खटखटाने की आवाजें आतीं हैं। हाल-चाल पूछ कर कर्तव्य की इतिश्री में माहिर लोग आसानी से किसी भी कार्यकर्ता का मन जीतने की कोशिश में सफल हो जाते हैं। अपेक्षा पाले फिर वही खांटी कार्यकर्ता दिन रात एक कर सुकून पा लेता है। परिणाम आते ही उसका मस्तक गर्व से उठ खड़ा हो जाता है। एक दो रोज उसकी खूब दिवाली मनती है। समय बीतता जाता है फिर शुरू हो जाता है अपेक्षा पर उपेक्षा का दंश। कार्यकर्ताओं की भीउ़ तो दिखती है पर चेहरे बदल जाते हैं । बारी फायदे की आती है तो उन कार्यकर्ता के नाम भी याद नहीं आते जिन्होंने न जाने ऐसे कितने 45 दिनों की चांदनी देखीं है। न जाने ऐसे कितने कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति को समाचार की अंतिम लाइन में उल्लेखनीय होते देखा है। उल्लेखनीय तो बेचारा कार्यकर्ता हमेशा ही होता है बस वक्त वक्त के हिसाब से उनका उल्लेख कभी होता है तो कभी नहीं होता। कार्यकर्ता तो फिर भी इस चार दिन के पो बारह में ही तस्सली प्राप्त कर लेता है। तभी तो दल भी कहतें हैं उसका कार्यकर्ता महान है।