इसी बहाने: वाह रे चुनाव, किसी की दिवाली तो किसी का दिवाला

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ह रे चुनाव, किसी की मनेगी दिवाली तो किसी का निकलेगा दिवाला। राजनीतिक लोगों के लिए यह दिवाली अन्य दिवाली से कुछ खास है। यहां चुनावी बम की चिंता है, जिसकी आवाज अभी से सुनी जा रही है। रोशनी के इस पर्व में कुछ के घर अंधेरा तो कुछ के घर उजाला ही उजाला होगा। फिलहाल तो टिकिट का गिफ्ट किसे मिलता है यह इस दिवाली का अहम हिस्सा होगा। दिवाली के पहले जिसे यह गिफ्ट मिल गया उसकी दिवाली खूब मनेगी, लेकिन इसी के साथ उसका दिवाला भी निकलना तय हो जाएगा। ऐन चुनाव के वक्त की यह दिवाली न मालूम किसके लिए शुभ सन्देश लेकर आती है। अभी तक तो नेता घर की पुताई-लिपाई छोड़ कर पार्टी मुख्यालय में भटक रहे हैं। उस एक गिफ्ट की खातिर जिसे टिकिट कहते हैं। प्रमुख दलों के दर्जनों माननीय कतार में खड़े हैं। मेरा नम्बर कब आएगा इसकी जुगत लगा रहे हैं। लाइन लम्बी है गिफ्ट देने वालों के सामने भी पशोपेश है। किसे दें, किसे खाली हाथ लौटाएं । मतलब किसकी दिवाली मनाएं और किसका दिवाला निकलवायें। दीपावली पर चुनावी चककल्स का यह दौर जनता को खूब भा रहा है। दीपावली की हर घर में हो रही तैयारियों के बीच तमाम घर ऐसे भी हैं जहां चुनावी दिवाली तैयारियां जोरों पर हैं। चुनाव आयोग मिठाई का एक टुकड़ा तक देने पर नजर जमाये है , तो मतदाता टिकट पर नजरें गड़ाए बैठा है। मुद्दे राजनीति के चक्रव्यू में खो गए हैं। अब से पहले दीपावली पर समाचार आते थे-मंहगाई के, मिठाई के, बर्तन-कपड़े, सोने-चांदी के, मगर इस बार समाचार मिल रहे हैं किसी की बेवफाई के, किसी की रुसवाई के तो किसी की नाराजगी के। कहीं से खबर आ रही है समीकरणों की तो कोई बखान कर रहा है अपनी उपलब्धियों की। जनता को अब तक न तो दीपावली के शुभ मुहूर्त की कोई खबर है न ही इस दिवाली कुछ खास होने की लालसा। चर्चा है तो बस चुनाव की। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि ऐसी ही दिवाली हर साल हो तो क्या होगा? माननीय निराश हैं। पहले तो उन्हें नवरात्र और दशहरा में पराया समझ लिया गया। एक भी फ्लेक्स बेनर में फोटू तक नजर नहीं आई। दुर्गा पंडाल में कल तक मंच और माइक पर कब्जा जमाने वाले दूर से देवी दर्शन कर रहे थे। कैमरे की नजर से बचने गली कुलियों में कार्यकर्ताओं से मिल रहे थे। उम्मीद थी दिवाली में सब ठीक हो जाएगा तो चुनाव आयोग की तीसरी नजर ने फिर खेल बिगाड़ दिया। अब मिठाई का डिब्बा तो दूर सोशल मीडिया पर शुभकामनाएं तक नहीं दे सकते। नेता जी उदास हैं। पहले ही टिकिट की चिंता से हैरान परेशान है रोज रोज कहीं दिल्ली की टिकिट लेना पड़ रही है तो कहीं भोपाल की।
दिवाली के गिफ्ट की भला इस बीच किसे चिंता। बहाना अच्छा है चुनाव आयोग का। टिकिटार्थी बेचारे दिवाली भूल कर अपने गिफ्ट को ही खोजने में व्यस्त है। 7 नवम्बर को कौन दिवाली मनाता है किसके घर मे दीपक जलते हैं यह जल्द ही पता लग जायेगा। एक अनार सौ बीमार की कहावत पूर्णत चरितार्थ हो रही है। ऊपर वाले मालिक के दरबार मे कोई मत्था टेका रहा है तो कोई दिवाली के एक हफ्ते बाद दिवाली मनाने की घोषणा कर रहा है। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्होंने इस बार पत्नियों को करवा चौथ का व्रत रखने से मना कर दिया वह स्वयं ही करवा चौथ का व्रत रखने वाले हैं
चलनी से जनता का चेहरा देखने वाले है। फिर जनता की ही पानी पिलाने की बारी होगी। दिवाली तो हर साल गरीब और मध्यम वर्गीय का दिवाला निकाल देती है। खुशी इस बात की कि इस बार कई उच्चवर्गीय लोगों का भी दिवाला निकलना तय है। चुनाव आयोग एक एक दिये में उसकी बाती से तेल तक पर नजर जमाये बैठा है। न तो दिये कि बाती लम्बी हो सकती न ही जरूरत से ज्यादा इसमे तेल भर सकता है। तो साफ है कि अपने आप मे खास है इस बार की दिवाली। हो भी क्यों न यह चुनावी दिवाली जो है इसमे न मालूम किसका दिवाला निकालता है और किसकी दिवाली मनती है…?

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