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तो ये था कांग्रेस बसपा गठबंधन फेल होने का कारण

राजनीतिक डेस्क। कांग्रेस और बसपा के बीच डील फेल होने की वजह वह 25 विधानसभा सीट्स हैं. जो शहरी इलाके की हैं. बसपा मध्यप्रदेश में 50 सीट्स चाहती थी. जिनमे 25 सीट्स इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, रीवा, राजगढ़ जैसे शहरी इलाकों की थीं. जहां बसपा का अपना कोई जनाधार नहीं है. कांग्रेस यह सीटें अगर बसपा के लिए छोड़ भी देती तो भी जीत भाजपा की ही होती. यहां भाजपा का जनाधार तगड़ा है लेकिन कांग्रेस भी यहां कमजोर नहीं है.
26/204 फॉर्मूला तय था

कांग्रेस के वरिष्ठ सूत्र बताते हैं कि बसपा ने आखिरी दौर में बातचीत को उस दौर में ला दिया था जहां किसी भी तरह का समझौता करना कांग्रेस के लिए बहुत मुश्किल था. एससी वर्ग की 35 में से कई आरक्षित सीट्स कांग्रेस को छोड़नी पड़तीं. इसका पूरा फायदा बीजेपी को मिलता. कांग्रेस 26/204 फॉर्मूले पर राजी थी. जो लगभग तय हो गया था. 26 बसपा 204 कांग्रेस. बसपा यूपी क्षेत्र से लगे सीमावर्ती इलाके विंध्य और चंबल, बुंदेलखंड की सीटों पर चुनाव लड़ेगी और कांग्रेस मध्यप्रदेश के बाकी हिस्से में.

इंदौर, भोपाल जैसे शहरो में बसपा

लेकिन आखिरी वक्त पर पूरा पांसा पलट गया. बसपा ने अपने प्रभाव क्षेत्र से बाहर की 25 सीटों पर दावेदारी ठोक दी. जहां किसी भी तरह का समझौता करना कांग्रेस के लिए संभव नहीं था. इंदौर की सांवेर, भोपाल की रायसेन, ग्वालियर की डबरा, राजगढ़ की सारंगपुर, जबलपुर पूर्व जैसी सीटें शामिल हैं. जहां बसपा अपना प्रत्याशी चाहती थी.

तो कांग्रेस को नुकसान

यहां सीधे तौर पर बसपा का जनाधार नहीं है. यहां से बसपा को टिकट देने का मतलब कांग्रेस को दो तरह का नुकसान था. एक तो उसकी आरक्षित वर्ग की लीडरशिप खतरे में पड़ रही थी. यह शहरी इलाका होने के कारण कांग्रेस के पास आरक्षित सीटों पर मजबूत उम्मीदवार हैं. जिनमें से कई पूर्व मंत्री तक शामिल हैं. दूसरा यहां पर बसपा की एंट्री शहरी इलाके की सामान्य सीट्स पर भी असर डालती. सवर्ण आंदोलन की आंच में हो रहा यह चुनाव अलग ही रंग ले लेता.

दो चुनाव में बसपा कमजोर

कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि गठबंधन से पहले बसपा का रेकार्ड देखें तो भी 50 सीटों की दावेदारी जायज़ नहीं लग रही थी. बसपा का जनाधार पिछले दो चुनाव में खिसकता दिखाई दे रहा है. साल 2008 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 8.97 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 2013 में उसे 6.29 प्रतिशत वोट मिले. बसपा की सीटें भी सात से घटकर चार रह गई हैं.

विंध्य-चंबल में बसपा

कांग्रेस विंध्य, ग्वालियर- चंबल, बुंदेलखंड में उन सीटों पर बसपा के साथ डील चाहती थी, जहां पर उसका सीधा प्रभाव है. यह इलाका कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया, अजय सिंह का इलाका है. पिछले चुनाव में ग्वालियर चंबल की 34 में से कांग्रेस को 12 सीटे मिली हैं. विंध्य की 30 में से 12 मिलीं. यहां भी ऐसी सीट्स जहां बसपा मजबूत है. और चुनाव में सीधा जातिगत गणित भारी है. वर्तमान में मुरैना की दो सीट रीवा, सतना की एक एक सीट बसपा के पास है.

कांग्रेस पर असर नहीं

कांग्रेस उपाध्यक्ष सी पी शेखर का कहना है कांग्रेस, बसपा के साथ गठबंधन के लिए पूरी तरह तैयार थी. बसपा ने 50 सीटों का प्रस्ताव रखा. उसमें से कई सीट ऐसी थीं जहां उनका प्रभाव नहीं था. ना ही पिछले चुनावों में उसे कुछ खास वोट हासिल हुए थे. कांग्रेस –बसपा का गठबंधन नहीं हो पाया इसका कोई असर कांग्रेस पर नहीं होगा.

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