गठबंधन न होने से BJP उत्साहित- 69 सीट पर BSP बिगाड़ सकती है कांग्रेस का खेल, ये था पिछले चुनाव का गणित

राजनीतिक डेस्क। अब वोटिंग तक गणित लगाने का खेल जारी है। राजनीतिक रणनीति कार अलग अलग दावों औऱ कयासों के बीच अलग अलग संभावनाएं तलाशने में जुटे हैं। इस बीच कांग्रेस और बसपा के संभावित गठबंधन नहीं हो पाने का लाभ भाजपा को मिलता दिख रहा है। जानकारों का मानना है कि मध्य प्रदेश में लंबे समय से चली आ रही कांग्रेस-बसपा गठबंधन की संभावना खत्म होने से भारतीय जनता पार्टी ने राहत की सांस ली है। पार्टी नेताओं की सोच है कि वोटों का बिखराव बढ़ने से भाजपा की राह प्रदेश में आसान हो रही है।

पिछले चुनाव परिणामों को देखें तो प्रदेश में 69 सीटें ऐसी हैं, जहां बसपा ने 10 फीसदी से ज्यादा वोट पाए हैं। ऐसे हालात में तय था कि अगर बसपा कांग्रेस का साथ दे दे तो भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी। अब बदले हुए सियासी हालात ने तय कर दिया है कि सरकार बनाने का सपना देख रही कांग्रेस के लिए मप्र जीतना खुली आंखों से सपने देखने जैसा ही है।

2008 में गठबंधन होता तो 4 फीसदी बढ़ जाता वोट बैंक

मप्र में कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन हो जाता तो कांग्रेस नेतृत्व वाले दल का वोट बैंक 4 फीसदी बढ़ जाता। 2008 में भाजपा ने 143, कांग्रेस ने 71 और बसपा ने 7 सीटें जीती थीं। भाजपा का वोट शेयर 37 फीसदी और कांग्रेस का 32 फीसदी रहा था, तब बसपा ने 9 फीसदी वोट प्राप्त किए थे। कांग्रेस और बसपा का वोट शेयर यदि जोड़ दें तो यह भाजपा से 4 फीसदी अधिक होता है। कांग्रेस और बसपा यदि मिलकर चुनाव लड़ते तो भाजपा को 90 और गठबंधन को 131 सीटें मिली होतीं।

लहर में तीन फीसदी पीछे रहे दोनों दल

2013 के चुनाव में जब पूरे देश में मोदी लहर चल रही थी, तब भी कांग्रेस और बसपा का वोट प्रतिशत जोड़ लिया जाए तो वे भाजपा से मात्र 3 फीसदी पीछे थे। ये उस स्थिति में था जब कांग्रेस के खिलाफ यूपीए की मनमोहन सरकार की एंटीइनकमबेंसी भी थी। 2013 के चुनाव में भाजपा ने 46 फीसदी वोट शेयर के साथ लगातार तीसरी बार सरकार बनाई। विपक्षी कांग्रेस को 37 और बसपा को 6 फीसदी वोट मिले थे। कांग्रेस और बसपा, दोनों का वोट शेयर मिलाकर 43 फीसदी होता। मुकाबला कांटे का होता और भाजपा के खाते में 125 सीटें आतीं, जबकि गठबंधन 102 सीटों पर जीत हासिल करता।

69 सीट पर निर्णायक रही है बसपा

बसपा के प्रभाव का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों (2003, 2008 और 2013) में औसतन 69 सीट पर पार्टी का वोट शेयर 10 फीसदी से अधिक रहा है। वहीं बसपा तीनों चुनावों में 13 सीटों पर विजयी और 34 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही है। इनमें से अधिकांश सीटों पर हार-जीत का अंतर बसपा के वोट शेयर से कम रहा है। स्वाभाविक है कि ऐसे हालात में बसपा 30 से ज्यादा सीट की मांग कर रही थी तो कहीं से गलत नहीं थी। इन सीटों पर उसका हक बनता था।

बसपा का वोट कांग्रेस को नहीं मिलता- डॉ दीपक विजयवर्गीय

मप्र में पिछले ढाई दशक में बसपा ने पहचान बनाई है। एक-दो मौके पर वह कांग्रेस के साथ भी खड़ी हुई पर कांग्रेस ने देश में दूसरे दलों के साथ जो धोखाधड़ी की, उसने वही काम मप्र में बसपा के साथ किया। कमलनाथ की तमाम आशावादिता के बाद भी बसपा का कांग्रेस के साथ जाना संभव नहीं था। गठबंधन हो भी जाता तो बसपा का प्रतिबद्ध वोटर कांग्रेस के साथ नहीं जाता। भाजपा के साथ सभी पक्ष और वर्ग के वोटर हैं। बसपा और कांग्रेस का वोटर भी प्रदेश । (मुख्य प्रवक्ता, मप्र भाजपा)