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जबलपुर HC की टिप्पणी: हम नागरिकों को तहजीब नहीं सिखा सकते लेकिन रेलवे को सुधार की सलाह अवश्य दे सकते हैं

बेशक हम नागरिकों को तहजीब नहीं सिखा सकते लेकिन रेलवे को सुधार की सलाह अवश्य दे सकते हैं यह टिप्पणी जबलपुर हाईकोर्ट ने रेलवे और यात्री के बीच एक मामले की सुनवाई करते क़ी।

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हेमंत गुप्ता व जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की युगलपीठ ने शनिवार को एक जनहित याचिका का इस टिप्पणी के साथ पटाक्षेप कर दिया कि बेशक हम नागरिकों को तहजीब नहीं सिखा सकते लेकिन रेलवे को सुधार की सलाह अवश्य दे सकते हैं। लिहाजा, रेलवे को ऑनलाइन रिजर्वेशन फॉर्म में गर्भवती महिलाओं के लिए नीचे की बर्थ के प्रावधान का कॉलम जोड़ने का मशविरा दिया जाता है।

मामले की सुनवाई के दौरान जनहित याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी डॉ.टीसी कृपलानी की ओर से अधिवक्ता अंशुमान स्वामी ने पक्ष रखा। जबकि रेलवे की ओर से नवतेज रूपराह खड़े हुए। जनहित याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि विकलांगों, वयोवृद्धों और गर्भवती महिलाओं को प्रथम श्रेणी वातानुकूलित रेल के डिब्बों में नीचे वाली बर्थ दी जानी चाहिए।

ऊपर की बर्थ देने से परेशान हुई थी गर्भवती

जनहित याचिकाकर्ता ने एक घटना का वर्णन किया। उसका कहना था कि एक गर्भवती महिला को ट्रेन में ऊपर वाली बर्थ आवंटित की गई थी। एक युवक नीचे की बर्थ में लेटा था। उससे काफी निवेदन किया गया कि वह बर्थ एक्सचेंज कर ले, लेकिन वह राजी नहीं हुआ।

रेलवे ने अपनी परेशानी बताई

सुनवाई के दौरान रेलवे के वकील ने दलील दी कि प्रथमश्रेणी वातानुकूलित डिब्बों में सीमित बर्थ होती हैं। उच्च अधिकारियों, नेताओं और न्यायमूर्तियों को प्राथमिकता देनी पड़ती है। इसलिए जनहित याचिका में की गई मांग को पूरा करना संभव नहीं है।

हाईकोर्ट ने पूरे मामले पर गौर करने के बाद कहा कि नागरिकों को गर्भवती महिलाओं और विकलांगों को प्राथमिकता देने की तहजीब या शिष्टाचार न्यायालय नहीं सिखा सकता, परन्तु रेलवे को सलाह दी जाती है कि वह प्रपत्र में ऐसा कॉलम निर्धारित करे, जिसे गर्भवती महिलाएं और विकलांग भर सकें। रेलवे की ऑनलाइन बुकिंग वेबसाइट में भी इस आशय का सुधार अपेक्षित है।

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