Advertisements

सिंधी समुदाय ने मनाया थदडी पर्व, सतहं के दिन खाया बांसी भोजन

धर्म डेस्‍क्‍। किसी भी धर्म के त्योहार और संस्कृति उसकी पहचान होते हैं। त्योहार उत्साह, उमंग व खुशियों का ही स्वरूप हैं। लगभग सभी धर्मों के कुछ विशेष त्योहार या पर्व होते हैं जिन्हें उस धर्म से संबंधित समुदाय के लोग मनाते हैं। ऐसा ही पर्व है सिंधी समाज का ‘थदड़ी’। थदड़ी शब्द का सिंधी भाषा में अर्थ होता है ठंडी, शीतल…।
रक्षाबंधन के सातवें दिन , हरठद के दूसरे दिन यानी  सतहं  के नाम से  इस पर्व को समूचा सिंधी समुदाय हर्षोल्लास से मनाता है। इसी क्रम में कटनी में सिंन्‍धी समुदाय के सभी महिलाओं ने सहतं पर्व मनाया
शीतला माता का पर्व सतहं

आज से हजारों वर्ष पूर्व मोहन जोदड़ो की खुदाई में माँ शीतला देवी की प्रतिमा निकली थी। ऐसी मान्यता है कि उन्हीं की आराधना में यह पर्व मनाया जाता है। थदड़ी पर्वको लेकर तरह-तरह की कई कहानियां हैं।
कहते हैं कि पहले जब समाज में प्राकृतिक घटनाओं को दैवीय प्रकोप माना जाता था। जैसे समुद्रीय तूफानों को जल देवता का प्रकोप, सूखाग्रस्त क्षेत्रों में इंद्र देवता की नाराजगी समझा जाता था। इसी तरह जब किसी को माता (चेचक) निकलती थी तो उसे दैवीय प्रकोप से जोड़ा जाता था तब देवी को प्रसन्न करने हेतु उसकी स्तुति की जाती थी और थदड़ी पर्व मनाकर ठंडा खाना खाया जाता था। आज भी इस परंपरा को पूरे विश्‍वास के साथ पालन किया जाता है।
हरछठ के दिन सभी महिलाओं ने तारा डूबने के पहले   तरह-तरह के व्यंजन बनाए । जैसे कूपड़, गच, कोकी, सूखी तली हुई सब्जियाँ- भिंडी, करेला, आलू, रायता, दही-बड़े, मक्खन आदि। आटे में मोयन डालकर शक्कर की चाशनी से आटा गूँथकर कूपड़ बनाए ।
मैदे में मोयन और पिसी इलायची व पिसी शक्कर डालकर गच का आटा गूँथा जाता है। अब मनचाहे आकार में तलकर गच तैयार किए । रात को सोने से पूर्व चूल्हे पर जल छिड़क कर हाथ जोड़कर पूजा की । इस तरह चूल्हा ठंडा किया जाता है।
ब्राम्‍हणी के घर में प्रार्थना 
 सतहं सप्‍तमी के  दिन पूरा दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है एवं एक दिन पहले बनाया ठंडा खाना ही खाया जाता है। इसके पहले परिवार के सभी सदस्य किसी नदी, नहर, कुएँ या बावड़ी पर इकट्‍ठे होते हैं वहाँ माँ शीतला देवी की विधिवत पूजा । इसके बाद बड़ों से आशीर्वाद लेकर प्रसाद ग्रहण किया । बदलते दौर में जहाँ शहरों में सीमित साधन व सीमित स्थान हो गए हैं। ऐसे में पूजा का स्वरूप भी बदल गया है।  अब कुएँ, बावड़ी व नदियाँ अपना अस्तित्व लगभग खो बैठे हैं। इसलिए अब ब्राम्‍हणी के  घरों में ही पानी के स्रोत जहाँ पर होते हैं वहाँ पूजा की जाती है। इस पूजा में घर के छोटे बच्चों को विशेष रूप से शामिल हुए और माँ का स्तुति गान कर उनके लिए दुआ माँगी  कि वे शीतल रहें व माता के प्रकोप से बचे रहें। इस दौरान ये पंक्तियाँ गाई ।
ठार माता ठार पहिंजे बच्चणन खे ठार
माता अगे भी ठारियो तई हाणे भी ठार…

 

इसका तात्पर्य यह है कि हे माता मेरे बच्चों को शीतलता देना। आपने पहले भी ऐसा किया है आगे भी ऐसा करना…।

इस दिन घर के बड़े बुजुर्ग सदस्यों द्वारा घर के सभी छोटे सदस्यों को भेंट स्वरूप कुछ न कुछ दिया । जिसे खर्ची कहते हैं। थदड़ी पर्व के दिन बहन और बेटियों को खासतौर पर मायके बुलाकर इस त्योहार में शामिल किया जाता है। इसके साथ ही उसके ससुराल में भी भाई या छोटे सदस्य द्वारा सभी व्यंजन और फल भेंट स्वरूप भेजे जाते हैं इसे ‘थदड़ी का ढि्‍ण’ कहा जाता है।

इस तरह परंपराएँ और आस्था अपनी जगह कायम रहती हैं बस समय-समय पर इसे मनाने का स्वरूप बदल जाता है। यह भी सच है कि त्योहार मनाने से हम अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं व सामाजिकता भी कायम रहती है।

 

हालाँकि आज विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि माता (चेचक) के इंजेक्शन बचपन में ही लग जाते हैं। परंतु दैवीय शक्ति से जुड़ा ‘थदड़ी पर्व’ हजारों साल बाद भी सिंधी समाज का प्रमुख त्योहार माना जाता है। इसे आज भी पारंपरिक तरीके से मिलजुल कर मनाया जाता है। आस्था के प्रतीक यह त्योहार समाज में अपनी विशिष्टता से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं और आगे भी कराते रहेंगे।