विधानसभा चुनावः सेबोटेज का डर कांग्रेस-भाजपा के लिए सिरदर्द

कटनी। अब सवाल यह है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में भितरघात किसे नुकसान पहुंचाएगी? पिछले एक वर्ष के समय पर गौर करें तो कांग्रेस ने गुटबाजी समाप्त करने का प्रयास किया है तो भाजपा ने इस दिशा में असंतुष्टों को इग्नोर करने की रणनीति अपनाई है

लिहाजा अब आसन्न चुनाव में असंतुष्टों से भाजपा को ज्यादा नुकसान सम्भव है, अपेक्षाकृत कांग्रेस के। दरअसल कांग्रेस के पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है, उसके असंतुष्ट भी अब यह जान चुके हैं लिहाजा वह खुल कर विरोध करने से बच रहे हैं लेकिन भाजपा में स्थिति विपरीत है।

यहां असंतुष्टों ने पहले ही मोर्चा खोल रखा है जहां संगठन से नाराज भाजपाइयों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। और तो औऱ कुछ भाजपाइयों ने तो कांग्रेस का दामन भी थाम लिया है, लेकिन इनके जनाधार से पार्टी को कोई ज्यादा नुकसान हो यह सम्भव नहीं है।

भाजपा और कांग्रेस की गुटबाजी का लाभ कटनी में तीसरा दल उठाये इसकी संभावना क्षीण ही है। भाजपा के खिलाफ उसके ही नेताओं की नाराजगी पार्टी को चुनाव में नुकसान पहुंचाएगी इस तथ्य पर जिले के भाजपाई बिल्कुल भी चिंतित नहीं हैं, बल्कि वो तो खुलेआम यह भी स्वीकारते हैं कि मन नहीं मिल रहा लेकिन नाराज कार्यकर्ता भी चुनाव के वक्त सक्रिय हो ही जायेगें या फिर उसे सक्रिय कर दिया जाएगा।

कांग्रेस में शहर और ग्रामीण अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ कुछ ऊर्जा का संचार तो दिख रहा है लेकिन इस ऊर्जा में जनाधार वाले नेताओं का टोटा नजर आ रहा है। खैर यह कोई नई बात नहीं है जब जब चुनावों का बिगुल बजता है इसकी ध्वनि सबसे पहले भितरघातियों तक पहुंचती है । पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के लिए इसे संभालने की चुनौती हर बार नजर आती है।

यही वो सिरदर्द है जिसे प्रमुख राजनीतिक दल चुनावों झेलते हैं इस बार भी ऐसा कुछ ही होने की उम्मीद है अलबत्ता यह परिणामों को कितना प्रभावित कर पायेगी यह तो रिजल्ट आने के बाद ही पता लगेगा। वर्ष 1998 में कांग्रेस के हाथ से निकली मुड़वारा सीट उसे दोबारा नसीब नहीं हुई।

इसमें बहुत हद तक भितरघातियों का रोल रहा है। इस चुनाव में भी इससे पार पाना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है भाजपा सत्ता की एंटीइन्कंबेंसी हीं नहीं संगठन की भी एंटीइंकंबेंसी से जूझ रही है ऐसे में भले ही उसके बड़े पदाधिकारी चिंतित नजर न आयें लेकिन परिणाम बिगड़ते देर नहीं लगती। कटनी में किन्नर कमला जान की जीत हो या फिर वर्तमान विधायक का निर्दलीय महापौर का चुनाव जीतना, उस वक्त भी भाजपा ने भितरघात को हलके में लेने की भूल की थी।