लोकसभा चुनाव 2019: बीजेपी के अपने, जो हो गए पराये!

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नेशनल डेस्‍क। ये सियासत है, जिसमें हवा के रुख के साथ साथी बदल जाते हैं. सत्तारूढ़  एनडीए  (नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस) के साथी भी एक-एक कर साथ छोड़ रहे हैं और इसे लीड करने वाली बीजेपी के अपने भी पराए हो रहे हैं. आखिर चुनाव घोषित होने से पहले पार्टी में ‘आयाराम-गयाराम’ का सिलसिला क्यों शुरू हो गया है?

सबसे नया मामला है राजस्थान का. यह प्रदेश विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है और वहां से बीजेपी का एक बड़ा नाम घनश्याम तिवाड़ी ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया. तिवाड़ी छठी बार विधायक हैं. तिवाड़ी ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर रखा था, लेकिन पार्टी उन पर कार्रवाई नहीं कर पाई. वह जयपुर (सांगानेर) से विधायक हैं.

उन्होंने भारत वाहिनी पार्टी  का गठन किया है, जो सभी 200 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ेगी. घनश्याम तिवाड़ी उन गिने चुने नेताओं में शामिल रहे हैं जिन्होंने राजस्थान में बीजेपी की जड़ों को जमाने का काम किया. 1980 में वे पहली बार सीकर से विधायक के रूप में विधानसभा पहुंचे थे. ये वो दौर था जब बीजेपी को चुनाव लड़वाने के लिए उम्मीदवार भी नहीं मिलते थे.

जाति से ब्राह्मण घनश्याम तिवाड़ी का अपने समाज पर जबरदस्त प्रभाव माना जाता है. यही वजह है कि 1980 के बाद से तिवाड़ी कई सीटें बदल चुके हैं लेकिन हर नई जगह से वे पहले से ज्यादा वोटों से जीतते हैं.

हरियाणा में पार्टी सांसद राजकुमार सैनी ने नई पार्टी बनाने की घोषणा कर दी है. वह जाट आरक्षण आंदोलन में सबसे बड़े गैर जाट नेता के रूप में उभर कर सामने आए थे. अगस्त में उनकी पार्टी की घोषणा संभव है. कुरुक्षेत्र से बीजेपी सांसद और ‘लोकतंत्र सुरक्षा मंच’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार सैनी ने कहा है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में सभी 90 विधानसभा सीटों पर उनकी पार्टी चुनाव लड़ेगी. राज्‍य की सभी 10 सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

माना जा रहा है कि जाट आरक्षण आंदोलन की वजह से जाट बिरादरी का बीजेपी को बहुत कम वोट जाएगा. बीजेपी को गैर जाट वोट जरूर करेंगे. लेकिन सैनी पार्टी लेकर उतरेंगे तो गैर जाट वोटों में खासतौर पर सैनी जाति के लोग बीजेपी से छिटक सकते हैं. सांसद सैनी लगातार बीजेपी पर हमलावर हैं, लेकिन पार्टी उन पर कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है.

बिहार की बात करें तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने बीजेपी छोड़ दी है. सिन्हा ने इसी साल 30 जनवरी को राष्ट्र मंच के नाम से एक नए संगठन की स्थापना की थी. हालांकि इसे गैर-राजनीतिक संगठन बताया था. हालांकि, यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा मोदी सरकार में मंत्री हैं. शत्रुघ्न सिन्हा बगावती सुर अपनाए हुए हैं. आए दिन वो पार्टी की नीतियों को निशाने पर लेते रहते हैं. हालांकि, उन्होंने यह बयान दिया है कि बीजेपी उनकी पहली और आखिरी पार्टी है. देखना यह होगा कि दोनों नेताओं की आलोचना से मतदाताओं पर कितना असर पड़ेगा?

महाराष्ट्र में बीजेपी सांसद रहे नाना पटोले ने सबसे पहले बगावती सुर अपनाते हुए दिसंबर 2017 में उन्होंने लोकसभा और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया था. पटोले भंडारा-गोंदिया सीट से लोकसभा के लिए चुने गए थे. किसानों के मसले पर सरकार को आड़े हाथों लेते हुए वो कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

रही बात भगवा ब्रिगेड की तो हिंदुत्व का बड़ा चेहरा प्रवीण तोगड़िया ने विश्व हिंदू परिष (VHP) के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद बना ली है. गुरुग्राम में 14 अप्रैल वीएचपी का चुनाव हुआ था. उनके समर्थक राघव रेड्डी  अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष पद का चुनाव विष्णु सदाशिव कोकजे से हार गए. इसके बाद उन्होंने सरकार के खिलाफ राम मंदिर, किसानों और युवाओं के मसले पर मोर्चा खोल दिया है. न्यूज 18 हिंदी से बातचीत में उन्होंने भविष्य में चुनाव लड़ने से इनकार नहीं किया. योगी आदित्यनाथ की हिंदू युवा वाहिनी में भी दो फाड़ हो गई है. योगी के खासमखास रहे गोरखपुर निवासी सुनील सिंह ने खुद को हिंदू युवा वाहिनी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर लिया है.

बीजेपी सांसद सावित्री बाई फुले, छोटेलाल खरवार, उदित राज, यशवंत सिंह और अशोक दोहरे जैसे दलित सांसदों की नाराजगी भी सत्तारूढ़ पार्टी की सेहत के लिए ठीक नहीं मानी जा रही है. सावित्री बाई फुले ने तो बाकायदा अपनी ही सरकार के खिलाफ रैली कर डाली थी. जिसमें उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार पर तीखे प्रहार किए. कहा, कि इस समय पूरे देश में दलित और पिछड़े परेशान हैं. उनका उत्पीड़न बढ़ रहा है.
उधर, सत्तारूढ़ एनडीए के घटक एक-एक कर टूट रहे हैं. पहले तेलुगू देशम पार्टी, फिर जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी…कुछ और भी इस लाइन में दिख रहे हैं. एनडीए की सबसे पुरानी सहयोगी शिवसेना पहले ही अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने का एलान कर चुकी है. इस बार उसने अलग होकर पालघर लोकसभा (महाराष्ट्र) सीट पर चुनाव लड़ा. उसे सीट गंवानी पड़ी. दरअसल, दोनों का कोर वोटर कट्टर हिंदू माना जाता है. ऐसे में माना जाता है कि बीजेपी महाराष्ट्र में शिवसेना का वोट बैंक अपनी तरफ शिफ्ट कर रही है. इसका नुकसान शिवसेना को हो रहा है. इसलिए शिवसेना लगातार बीजेपी पर मुखर है. नफा-नुकसान का आकलन करते हुए उसने 2019 का चुनाव बीजेपी से अलग लड़ने का फैसला किया. हालांकि, वह अभी एनडीए से अलग नहीं हुई है.

शिरोमणि अकाली दल हरियाणा विधानसभा चुनाव में अकेले उतरना चाहती हैं, जहां बीजेपी की सरकार है. उपेंद्र कुशवाहाकी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का कुछ पता नहीं कि वो किसके साथ जाएगी. इन दिनों जेडीयू से भी बीजेपी के रिश्ते सहज नहीं दिख रहे हैं. नीतीश कुमार केंद्र सरकार की कुछ नीतियों पर आलोचक की मुद्रा में दिखाई दे रहे हैं. यूपी में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता और योगी कैबिनेट के मंत्री ओम प्रकाश राजभर आए दिन बीजेपी की आलोचना करते रहते हैं.

राजनीतिक विश्लेषक आलोक भदौरिया कहते हैं “बीजेपी कोशिश यही करेगी कि किसी भी तरह उसके मौजूदा सहयोगी 2019 के लोकसभा चुनाव में साथ रहें. दूसरा वह ऐसे भावनात्मक मुद्दों को भी ले आएगी, जिससे उसका सत्ता तक जाने का रास्ता बने. जैसे कश्मीर, आतंकवाद और राम मंदिर मुद्दा.”

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