विधानसभा चुनाव: कास्ट बेस्ड पॉलिटिक्स का यहां कोई स्थान नहीं

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कटनी। विधानसभा चुनाव में पिछले इतिहास पर गौर करें तो कटनी जिले में जातिगत समीकरणों का ज्यादा प्रभाव नहीं दिखा है। वैसे तो बड़वारा सुरक्षित सीट को छोड़ दिया जाए तो कटनी की बाकी बची तीनों सीट कटनी मुड़वारा, विजयराघवगढ़ और बहोरीबंद में जातिगत समीकरणों के मायने बेमानी ही निकले।

अच्छा यह है कि जिले के मतदाता प्रत्याशी चुनते हैं किसी जाति विशेष को कभी नहीं। लिहाजा कोई भी दावेदार या प्रत्याशी यह दंभोक्ति बिल्कुल नहीं कर सकता कि उसकी जाति के मतदाता अधिक हैं तो दावा मजबूत है। कटनी मुड़वारा सीट का उदाहरण लिया जाए तो यहां वो सभी प्रत्याशी जीत कर आये हैं जो अलग अलग जातियों से संबंध रखते हैं। ब्राह्मण, ठाकुर, जैन, अन्य पिछड़ा, वैश्य इत्यादि। हर बार यहां जातियों ने सभी को मौका दिया है। वैसे कास्ट बेस्ड पालिटिक्स के लिए कटनी में कोई स्थान नहीं यह अच्छी बात है।

जब पूरे देश मे जातिवाद का जहर राजनीति के लिए नासूर बन रहा है तब कटनी इसका उदाहरण ही है कि यहां कास्ट बेस्ड पालिटिक्स को कोई महत्व नहीं। यहां तो कार्य करने वाला व्यक्ति ही जीतता है। मिलनसार, जनता के बीच अच्छी छवि अथवा सहज सुलभ व्यक्ति को ही मतदाता चुनते हैं। इसे कटनी के मतदाताओं की पॉजिटिव थ्योरी ही कहा जाए तो ठीक होगा।

कटनी में जाति विशेष प्रत्याशियों ने समय समय पर भले ही अलग अलग दावे कियें हो पर वो भी जानते हैं कि कास्ट बेस्ड पॉलिटिक्स का कटनी की कम से कम तीन सीटों पर तो कोई लेना देना नहीं। बहरहाल राजनीतिक दलों के लिए भी यही कारण है कि वह किसी जाति विशेष प्रत्याशी को टिकट का आधार बनाने को प्राथमिकता नहीं समझते। बहोरीबंद में कास्ट बेस्ड पालिटिक्स को लेकर अक्सर चुनाव के पहले या फिर चुनाव के बाद कई तरह की बातें सुनने को मिलती हैं पर परिणामों के बाद यह सभी समीकरण बौने ही नजर आते हैं। बहोरीबंद में कास्ट बेस्ड पालिटिक्स के चलते ही पिछले कई चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने ताल ठोंकी लेकिन किसी को भी सफलता नहीं मिल सकी।

इधर मुड़वारा विधानसभा की बात हो तो यहां भी कांग्रेस ने पिछले विधान सभा चुनाव और उसके बाद महापौर की टिकट जाति विशेष को देकर वोटों के ध्रुवीकरण की उम्मीद जताई थी, लेकिन कांग्रेस की यह रणनीति काम नहीं आई। जनता ने दोनों ही दफे जाति से ज्यादा व्यक्ति को महत्व दिया। विजयराघवगढ़ में उपचुनाव में फिर से कांग्रेस ने जाति का कार्ड खेलकर भाजपा को घेरने की कोशिश की लेकिन उसे मुंह की ही खानी पड़ी। साफ है कास्ट बेस्ड पॉलिटिक्स के लिए जिले में कोई स्थान नहीं।

अब जबकि फिर से विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही प्रत्याशी चयन और दावेदारों के हाथ पैर चलाने का दौर शुरू हो चुका है अपनी-अपनी जाति के वोटों के निचोड़ को खंगाल कर दावेदार पार्टी के आकाओं को यह बताने में जुटे हैं कि उन्हें टिकट देने पर उनकी जाति के वोटों का ध्रुवीकरण ही पक्ष में हो जाएगा, लेकिन दावेदार की यह दलील कटनी के पिछले चुनाव परिणामों को गौर करने के बाद बेमानी ही साबित होती है। फिलहाल कटनी और बहोरीबंद में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त दिखाई पड़ रही है। इन दोनों ही सीटों पर कांग्रेस और भाजपा के लगभग आधा दर्जन दावेदार सक्रिय हैं।

खास बात यह है कि दोनों ही विधानसभाओं में ये सभी दावेदार अलग अलग जाति से संबंधित हैं भले ही ये सभी कास्ट बेस्ड पालिटिक्स को काफी बढ़ा चढ़ा कर अपने आप को जीत के पैमाने पर खरा बता रहे हों लेकिन इससे बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता कि कास्ट बेस्ड पालिटिक्स से किसी भी राजनीतिक दल को ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। यहां पैमाने और भी हैं जो मतदान को प्रभावित करते रहे हैं ।

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