यशभारत सर्वे: विधानसभा चुनाव 2018 पनागर सीट- तो बदल जायेंगे समीकरण

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जबलपुर। विधानसभा चुनाव 2018 को लेकर यशभारत द्वारा कराए सर्वे में आज जिले की चौथी विधानसभा सीट का विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके पहले कैंट, पश्चिम और बरगी की रिपोर्ट प्रकाशित की जा चुकी है। उसके बाद चौथी विधानसभा है पनागर विधानसभा सीट जो कहने को तो ग्रामीण सीट है लेकिन इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा शहर से लगा हुआ है जिसमें शहरी मतदाताओं का प्रभाव है।

इसके अलावा मंडला जिले की सीमा से लगे हुए कुछ गांव व बरगी विधानसभा से सटा हुआ कुछ क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य भी है। इसके साथ ही पनागर में जातिगत समीकरण भी अहम रहते हैं लेकिन पिछले चुनावों में जातिगत समीकरण कहीं न कहीं नगण्य ही साबित हुए थे। लेकिन इस बार कांग्रेस की ओर से दावेदारों में सबसे ज्यादा समीकरण की बात हो रही है।
यदि पनागर विधानसभा सीट के मतदाताओं का मिजाज समझें तो यह कहीं न कहीं सत्तामुखी रहा है। और परिसीमन के बाद यह भाजपा के साथ जुड़ा रहा। नए परिसीमन में कुछ ऐसी स्थितियां बनाई की भाजपा का समर्थित माना जाने वाला वोट बैंक सेन्ट्रलाइज हो गया वहीं कांग्रेस की तरफ झुकाव रखने वाला वोट बैंक दो विधानसभाओं में बंट गया। यदि 2018 के समीकरणों को देखें तो भाजपा सरकार के प्रति वोटरों में कुछ खास गुस्सा समझ में नहीं आ रहा। हां किसान वर्ग जरूर प्रदेश सरकार से कुछ हद तक नाखुश है लेकिन जो बड़ा क्षेत्र शहरी मतदाताओं का है वह भाजपा की ओर झुका हुआ है। लेकिन संगठनात्मक दृष्टि से देखें तो कुछ पदाधिकारी जरूर पार्टी से विपरीत दिशा में जाते दिख रहे हैं। लेकिन वे मैदान में कितने कारगर होंगे इसमें अभी भी संशय है।
वहीं कांग्रेस की बात करें तो यहां सक्रियता में कोई कमी नहीं दिख रही लेकिन अधिक सक्रियता के चलते मतदाताओं में भ्रम की स्थिति है। कांग्रेस से जो लोग मैदान में हैं वे प्रदेश सरकार की आलोचना तो करते हैं लेकिन क्षेत्रीय मुद्दों से अभी भी दूरी बनाए हुए हैं जिसके चलते वोटरों का सीधे झुकाव नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस पार्टी को लेकर तो कांग्रेस का वोटर पूरी ताकत से भिड़ने की बात कर रहा है। लेकिन जब कैन्डिडेट की बात सामने आती है तो उसमें बिखराव साफ समझ में आ रहा है।


भाजपा की बात करें तो उसको लेकर लोगों में न तो उत्साह की स्थिति है न ही कुछ विशेष विद्रोह समझ में आ रहा है। जिसके पीछे कारण यह है कि कांग्रेस अपनी बात लोगों तक पहुंचा नहीं पा रही है। कुछ मतदाताओं का तो यहां तक कहना है कि कांग्रेस के आपसी मतभेद ही भाजपा को ताकत दे रहे हैं। मतभेद की कमी भाजपा में भी नहीं है लेकिन वह खुलकर सामने नहीं आ पाते। ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर पिछड़े हुए क्षेत्रों में कांग्रेस ने अपने आप को थोड़ा बहुत मजबूत तो किया है लेकिन शहर से सटे हुए व उपनगरीय क्षेत्रों में भाजपा पहले जैसी मजबूत स्थिति में बनी हुई है।
यदि जातिगत फैक्ट की बात की जाये तो सर्वे में जाति विशेष का एक संगठन खुलकर जातिवाद पर चुनाव लड़ने की बात कर रहा है। लेकिन वेाटों के इस ध्रुवीकरण के विषय में जब दूसरे समाज के लोगों से बात की गई तो दूसरा पक्ष भी केन्द्रित से कहीं ज्यादा विरोध की मुद्रा में नजर आया। वहीं यह बात भी सामने आई की यदि कांग्रेस विकास और क्षेत्रीय मुद्दों से ज्यादा जातिगत समीकरणों पर जोर लगाएगी तो परिणाम 2013 जैसे भी हो सकते हैं। सीधी सी बात यह है कि जातिगत वर्गीकरण समाज विशेष के वोटों को संगठित तो करेगा लेकिन बाकी वोट दूसरी तरफ केन्द्रित हो सकते हैं।

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