आखिर कहाँ है माता कौशल्या की जन्म भूमि? पाटेश्वर धाम में मन्दिर निर्माण को लेकर विवाद

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धर्म डेस्क। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 30 किमी दूर चंद्रखुरी में मां कौशला की जन्मभूमि होने का दावा अब तक किया जाता रहा है, लेकिन अब बालोद के पाटेश्वर धाम को जन्मभूमि बताकर मंदिर निर्माण शुरू कराए जाने पर विवाद गहरा गया है।

चंदखुरी के ग्रामीणों का कहना है कि सातवीं शताब्दी में बने कौशल्या देवी का यह प्राचीन मंदिर है। उनकी जन्मस्थली यही है। सोमवंशी राजाओं द्वारा माता कौशल्या और उनके बेटे की प्रतिमा स्थापित की गई थी, इसकी पुष्टि शोध में भी हुई है। यहां यह बता दें कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इसी स्थान को मां कौशल्या की जन्मभूमि बताया था लेकिन इसके जन्मभूमि होने के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
बालोद में गौसेवा आयोग छत्तीसगढ़ के श्रीराम बालक दास के संरक्षण में भव्य मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। इस स्थान को वह मां कौशल्या देवी की जन्मभूमि होने का दावा कर रहे हैं। इससे चंदखुरी के ग्रामीण भड़क गए हैं। ग्रामीणों ने सड़क पर उतरने व धर्मस्व मंत्री से मिलने का एलान किया है। अवर सचिव, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग एसके तिवारी कहते हैं कि जन्मस्थली के दावों के बीच किसी तरह के विवाद की सूचना फिलहाल हमें नहीं दी गई है। अगर कोई समिति संपर्क करती है तो मामले को संज्ञान में लिया जा सकता है।

इतिहास जानने को करवाएं खुुदाई : डॉ.अरूण

छत्तीसगढ़ के मशहूर पुरातत्ववेत्ता डॉ. अरूण कुमार शर्मा बताते हैं कि प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ को कौशल प्रदेश के रूप में जाना जाता था और आरंग क्षेत्र को राजा मोरध्वज के शासन काल का प्रमुख केंद्र भी माना जाता है। चूंकि आरंग के समीप ही चंद्रखुरी गांव है जहां तालाब में माता कौशिल्या की प्रतिमा प्राप्त हुई थी। इसके चलते यह क्षेत्र माता कौशिल्या की भूमि के रूप में प्रचलित हो गया है। वास्तविक इतिहास जानने के लिए चंद्रखुरी इलाके की खुुदाई करवाने की आवश्यकता है। हालांकि इस इलाके में महापाषाण कालीन बड़े-बड़े पत्थर प्राप्त हुए थे जिन्हें टुकड़े-टुकड़े करके सड़क बनाने में इस्तेमाल कर लिया गया।

सातवीं शताब्दी में बना था माता कौशल्या का मंदिर

दरअसल चंदखुरी के ग्रामीणों का कहना है कि सातवीं शताब्दी में बने कौशल्या देवी का मंदिर यहीं है, देश में और कहीं नहीं है। सोमवंशी राजाओं द्वारा माता कौशल्या और उनके बेटे की प्रतिमा स्थापित करने की मान्यता मिलती है।

कई बार वैज्ञानिक रिसर्च भी हो चुके हैं। सात तालाबों के बीच यह मंदिर बनाया गया है। अभी कौशल्या जन्मभूमि के नाम से किया जा रहा प्रचार प्रसार बिल्कुल गलत है। समिति की तरफ से बैठक में अध्यक्ष देंवेंद्र सिंह वर्मा, भरत भूषण साहू, संतोष सेन, मालिकराम वर्मा, ओमप्रकाश साहू, सोहनलाल चतुर्वेदी समेत अन्य ग्रामीण शामिल हुए।

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