कांग्रेस से कभी छिपे हुए दोस्त तो कभी दबाव की राजनीति खेल रही बसपा

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नेशनल डेस्‍क। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में जिस तरह संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं बसपा सुप्रीमो मायावती ने गर्मजोशी से बाहों में बाहें डालकर मिलते हुए देखा गया है उसके बाद इस बात पर यकीन करना मुश्किल है किमध्यप्रदेश में बसपा और कांग्रेस की राहें अलग-अलग होंगी. हाल ही में ऐसे कई मौके आए हैं जिसने साबित किया है कि कांग्रेस और बसपा एक छिपे हुए दोस्त की तरह मिल रहे हैं. और मौका आने पर दबाव की राजनीति भी खेल रहे हैं.

मध्यप्रदेश बसपा-कांग्रेस गठबंधन को लेकर कोई भी संभावना जताने से पहले राष्ट्रीय राजनीति पर नजर रखने की जरूरत है. जहां दोनों ही दल एक दूसरे के खास होने की गवाही दे रहे हैं.

हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की इफ्तार पार्टी में बसपा सुप्रीमों के सबसे भरोसेमंद नेता सतीश मिश्रा ने शिरकत की है. दूसरी ओर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल के राज्यसभा में जाने का रास्ता भी मायावती ने ही उत्तर प्रदेश से बनाया था. सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में मायावती के वकील भी हैं.

मध्यप्रदेश बसपा-कांग्रेस गठबंधन को लेकर कोई भी संभावना जताने से पहले राष्ट्रीय राजनीति पर नजर रखने की जरूरत है. जहां दोनों ही दल एक दूसरे के खास होने की गवाही दे रहे हैं.
राष्ट्रीय राजनीति में देखें तो बसपा को भी कांग्रेस का साथ चाहिए. 2014 की मोदी लहर ने बसपा का पत्ता ऐसा साफ किया है कि लोकसभा में उसका खाता ही नहीं खुल पाया है.

मामला वोट शेयर को देखते हुए सीटों के बंटवारे का है. कर्नाटक में जेडीएस को मिले कांग्रेस के एक तरफा समर्थन के बाद तो बसपा का मध्यप्रदेश में ज्यादा से ज्यादा सीटों पर दबाव बनाना स्वाभाविक है. बसपा ने उत्तरप्रदेश उपचुनाव और कर्नाटका चुनाव में साबित कर दिया है कि वह एकमात्र पार्टी है जो दमदारी से अपना वोट ट्रांसफर करने की ताकत रखती है. इसलिए मानना चाहिए कि चुनावी तैयारियों के आखिरी दौर तक आते-आते कांग्रेस और बसपा के बीच रिश्तों की घोषणा अधिकृत तौर पर हो जाएगी.

कांग्रेस के लिए कहा जा रहा है कि उसे बीएसपी की सख्त जरूरत है. बसपा का वोट प्रतिशत हासिल कर वह भाजपा की आसान राह को रोक सकती है. लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में देखें तो बसपा को भी कांग्रेस का साथ चाहिए. 2014 की मोदी लहर ने बसपा का पत्ता ऐसा साफ किया है कि लोकसभा में उसका खाता ही नहीं खुल पाया है. सवा दो करोड़ वोट और 4 प्रतिशत से ज्यादा वोट प्रतिशत हासिल करने के बाद भी बसपा लोकसभा में गायब है.

फिलहाल बसपा दबाव की राजनीति अपना रही है. इस बात में दम इसलिए भी लगता है क्योंकि पिछले पांच उपचुनाव में मध्यप्रदेश में बसपा ने कांग्रेस को समर्थन देते हुए अपने प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारे. जिसका परिणाम यह रहा कि कांग्रेस चार चुनाव जीत गई. हालांकि यूपी के उपचुनाव में सपा-बसपा के बीच गठबंधन हुआ तो कांग्रेस अलग –थलग रही. तब भी इस बात की चर्चा रही कि बसपा सिर्फ यूपी में ही नहीं तीनों ही हिंदी पट्‌टी के राज्यों में भी कांग्रेस के साथ गठबंधन चाहती है.

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