खेल डेसक। जिस खेल आयोजन के विजेता को ढाई अरब रुपए और ग्रुप दौर से ही बाहर होने वाली टीम को करीब 54 करोड़ रुपए की ईनामी राशि मिलती हो, उसकी भव्यता का अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है। जी हां, बात फीफा विश्वकप की हो रही है, जिसका आयोजन रूस के 11 शहरों के 12 स्टेडियमों में होने जा रहा है। फुटबॉल के इस महाकुंभ के आयोजन से 33 खरब रुपए की कमाई का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। 31 दिन तक चलने वाले इस टूर्नामेंट में कुल 64 मैच खेले जाएंगे। इस दौरान पूरी दुनिया फुटबॉल के रोमांच से सराबोर होगी। यह भी तय है कि इस दौरान भारतीय खेल प्रशंसकों का एक बड़ा वर्ग क्रिकेट से फुटबॉल की ओर शिफ्ट हो जाएगा। मैदान पर खिलाड़ियों की एक-एक किक करोड़ों रुपए की साबित हो सकती है। इस आयोजन की सबसे महंगी टिकट की कीमत लगभग 70 हजार रुपए की होगी, जबकि पिछले आयोजनों में यह कीमत और भी अधिक हुआ करती थी। विजेता को मिलने वाली ट्रॉफी तकरीबन 68 करोड़ रुपए की होगी, जो 18 कैरेट सोने की बनी होगी। माना जा रहा है कि दुनिया की करीब आधी आबादी इस खेल महाकुंभ को देखेगी।

इस टूर्नामेंट की महत्ता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि चार बार की चैंपियन इटली, तीन बार की फाइनलिस्ट नीदरलैंड, कोपा अमेरिका कप की चैंपियन चिली और हाल में फ्रांस जैसी दिग्गज टीम से बराबरी पर खेलने वाली अमेरिकी टीम क्वॅालीफाई ही नहीं कर पाई हैं। वहीं पेरू को 36 साल बाद, मिस्र और मोरक्को को 20 साल, ट्यूनीशिया को 16 साल बाद और पनामा को पहली बार फीफा विश्वकप में प्रवेश मिला है। टूर्नामेंट में भाग ले रही 32 टीमों को पिछले आयोजनों की तरह ही आठ वर्गों में बांटा गया है। हालिया फॉर्म को देखते हुए ब्राजील, जर्मनी, स्पेन और फ्रांस की टीमें सबसे मजबूत मानी जा रही हैं। इनके बाद अर्जेंटीना, बेल्जियम, पुर्तगाल और इंग्लैंड का नंबर आता है। इन आठ टीमों में से छह यूरोप की हैं और दो लैटिन अमेरिका से।

वर्ष 1930 से चले आ रहे फुटबॉल विश्वकप में अभी तक यूरोप और लैटिन अमेरिका देशों का दबदबा रहा है। यूरोप की टीमों ने 11 बार और लैटिन अमेरिका की टीमों ने नौ बार इस प्रतिष्ठित खिताब को जीता है। दिलचस्प यह है कि 84 साल में केवल आठ देशों को ही चैंपियन बनने का अवसर मिला है। इनमें तीन टीमें लैटिन अमेरिका से (ब्राजील, अर्जेंटीना और उरुग्वे) और पांच टीमें यूरोप से (जर्मनी, इटली, स्पेन, फ्रांस और इंग्लैंड) हैं।

हाल के समय में यूरोपीय टीमें फुटबॉल की दुनिया में बढ़त पर हैं। दुनिया के किसी भी कोने में शानदार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों पर यूरोपीय क्लबों की नजर रहती है। यही वजह है कि लियोनेल मैसी और रोनाल्डिन्हो की पहचान बार्सिलोना क्लब से, एगुवेरो की मैनचेस्टर सिटी से और मार्सेलो की रियाल मैड्रिड से बनी है।

रूस में फीफा विश्वकप का यह पहला आयोजन होगा। उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन पूर्व सोवियत संघ के रूप में 1966 के विश्वकप में था, जब उसने सेमीफाइनल तक अपनी चुनौती रखी थी। रूस एक बड़ा देश है। उसके 11 शहरों के बीच काफी दूरी है। इसके चलते सभी टीमें ग्रुप दौर में ही करीब दो लाख किमी की दूरी तय करेंगी। एक तरह से वे रूस की संस्कृति के साथ उसके भूगोल से भी परिचित होंगी।

दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों की नजर तीसरा विश्वकप खेल रहे अर्जेंटीना के लियोनेल मैसी और पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो पर खास तौर पर होगी, जिनके बीच फीफा के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनने को लेकर प्रतिस्पर्द्धा रहती है। इसी तरह उरुग्वे के लुइस सुआरेज, चोट से उबरे ब्राजीली स्टार नेमार, मिस्र के मोहम्मद सालाह, स्पेनिश गोलकीपर डेविड डे गिया और जर्मन गोलकीपर मैनुअल नोयर के बीच भी श्रेष्ठता की होड़ देखने को मिल सकती है। पिछले विश्वकप में सबसे अधिक छह गोल करने वाले कोलंबियाई मिडफील्डर जेम्स रॉड्रिग्स भी चर्चा में रहेंगे। हालांकि वह पिछले 39 क्लब मैचों में आठ गोल ही कर पाए हैं। इसी तरह जर्मन फॉरवर्ड थॉमस मुलर पर भी सबकी निगाहें रहेंगी। वह विश्वकप के 13 मैचों में अब तक 10 गोल कर चुके हैं।

फुटबॉल की पहुंच और लोकप्रियता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि आज संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या 193 है और फीफा के 214 सदस्य हैं। फुटबॉल की लोकप्रियता के कारण इस खेल को एक संस्कृति के तौर भी जाना जाता है। एक संपूर्ण खेल के रूप में यह सेहत के लिहाज से उत्तम खेल है। कई देश इसलिए फुटबॉल को विशेष महत्व देते हैं, ताकि किशोरों एवं युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा देने में आसानी हो।

फुटबॉल विश्वकप में एशिया से सऊदी अरब, ईरान, कोरिया गणराज्य, जापान की टीमें हिस्सा ले रही हैं। ऑस्ट्रेलिया भी इसी जोन में आता है। यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर भारत इस विश्वकप से दूर क्यों है? विश्वकप के हर आयोजन में यह सवाल उठता है और भारतीय फुटबॉल टीम को कोसने के लिए कुछ तर्क तलाश कर लिए जाते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। भारतीय फुटबॉल सही दिशा में है। वह पिछले विश्वकप के दौरान अपनी रैंकिंग को 171 से आज 97 पर ले आया है। यानी बीते चार वर्षों में उसने 74 पायदान की लंबी छलांग लगाई है। एशिया में भारत की रैंकिंग 14 है। भारतीय कप्तान सुनील छेत्री ने भारतीय फुटबॉल के लिए टॉप टेन में आने का लक्ष्य रखा है। पिछले दिनों भारत ने मुंबई में आयोजित इंटर कांटिनेंटल कप अपने नाम किया। भारतीय टीम ने 2019 में होने वाले एएफसी एशियन कप के लिए भी क्वॅालिफाई किया है। बीते साल भारतीय फुटबॉल टीम विश्वकप चैंपियन जर्मनी और एक अन्य टीम बेल्जियम की तरह दुनिया की इकलौती ऐसी टीम थी, जो साल भर अपराजित रही। भारत ने वर्ष 2017 में 12 में से 11 मैचों में जीत दर्ज की और उसका एक मैच ड्रॉ रहा। स्टार खिलाड़ी सुनील छेत्री ने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में सबसे अधिक 64 गोल करने के मैसी के रिकॉर्ड की बराबरी की है। उनके अलावा आईएसएल के पहले सीजन के स्टार सेंटर बैक संदेश झिंगन और बेंगलुरु एफसी में सुनील छेत्री के शागिर्द उदांता सिंह के खेल को भी खूब सराहा गया है।

हाल के समय में फुटबॉल के मामले में देश के घरेलू ढांचे में भी काफी सुधार हुआ है। अब सात से आठ महीने तक भारतीय खिलाड़ी प्रतियोगिताओं में व्यस्त रहते हैं। आईएसएल या आई लीग के अलावा हीरो सुपर कप में खिलाड़ियों को लगातार मौके मिलते हैं। जाहिर है कि भारतीय फुटबॉल इस समय सही ट्रैक पर है। जरूरत बस और रफ्तार पकड़ने की है।