Advertisements

भाजपा का “मधुर मिलन” : आगाज बेहतर है, अंजाम वक्त बताएगा

वेब डेस्क। विपक्षी एकता की कवायद के बीच बीजेपी 2019 के मिशन रिपीट को सफल बनाने के लिए पूरी तरह एक्शन मोड  में आ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां सरकारी योजनाओं और आयोजनों के जरिए जनता के नजदीकियां पुख्ता करने पर ध्यान केंद्रित किया है ,वहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ‘सम्पर्क से समर्थन मांगने निकले हैं।  इस बहाने वे जहां शिवसेना और अकाली दल जैसे रूठों को मनाने की कोशिश में दिखे वहीं उन्होंने माधुरी दीक्षित, रतन टाटा और कपिल देव जैसी हस्तियों से मिलकर साफ कर दिया कि बीजेपी किसी भी ऐसे शख्स को अनछुआ नहीं छोडऩा चाहती जिसका भारतीय जनमानस पर थोड़ा सा भी प्रभाव हो।
Yashbharat
जाहिर है यह एक फुलप्रूफ प्लान है। भारत जैसे देश में  सेलिब्रिटीज अधिकांश लोगों के लिए ओपिनियन मेकिंग का काम करते हैं। टीवी विज्ञापनों पर चप्पल, बनियान से लेकर सपनो का घर तक बेचते  अभिनेता और मॉडल्स इसका  उदाहरण हैं। ऐसे में बीजेपी ने इन्हीं प्रभावशाली लोगों को साधने की प्लानिंग की है ताकि उनके प्रभाव का असर पार्टी के वोट बैंक पर दिखे और पार्टी लोकसभा में एकबार फिर से बहुमत पा जाए। बिना शक यह गजब का प्लान है।
Yashbharat
अलबत्ता एक दूसरा भाव यह भी है कि जो सरकार चार साल से सत्ता में है उसे अब सम्पर्क की क्या जरूरत है। यह तो 2014  में होना चाहिए था। अब तो बीजेपी वैसे भी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है। जब कोई पार्टी सत्ता में हो और फिर से सिंहासन की इच्छा करे तो लोकतंत्र में एक ही रास्ता है। सरकार अपने काम जनता के सामने रखती है।  बताया जाता है कि  हमने यह किया , ऐसे किया और इसका यह लाभ हुआ। ग्राम पंचायतों से लेकर संसद  तक सत्ता  रिपीट करने के लिए  वोट मांगने का यही नुस्खा है।  तो क्या बीजेपी के पास चार साल के बाद भी ऐसा कुछ ख़ास नहीं है जिसे बघार कर पार्टी एक और मौके   की मांग आम जनता से कर सके ? यह प्रश्न निश्चित ही विचारणीय है।
Yashbharat
ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने चार साल में कुछ नहीं किया होगा. कुछ तो ऐसा होगा जिसे पूरे कॉन्फिडेंस के साथ  सामने रखा जा सकता है, लेकिन अगर इसके बावजूद पार्टी ने  सम्पर्क से समर्थन जैसा अभियान चलाया है तो स्पष्ट है कि सरकार के काम में कहीं न कहीं कुछ कमी रह गई है। इसलिए ऐसे  मधुर मिलन की जरूरत पड़  रही है।  बिना शक सरकार पर अब तक किसी बड़े  या छोटे घोटाले के आरोप नहीं लगे हैं। बीजेपी की राज्य सरकारें भी अपेक्षाकृत भ्ष्र्टाचार के दाग से बचने में कामयाब हुई हैं ,लेकिन  कालेधन की स्वदेश वापसी, ईंधन के दामों में बढ़ोतरी  जैसे मसले चुनाव में पीछा कर सकते हैं. इसलिए बीजेपी को सेकण्ड  प्लान की जरूरत पडी और  उसी के तहत यह अभियान चलाया गया है।
Yashbharat
शुरुआत के पीछे का गणित 
बीजेपी ने अपने इस ‘सम्पर्क से समर्थन ‘ अभियान की शुरुआत पूर्व थलसेना अध्यक्ष दलबीर सुहाग से मिलकर की। आम सियासी पंडित इसे  बीजेपी की हरियाणा में  कांग्रेस खासकर हुड्डा को चुनौती की तयारी के रूप में देख रहे हैं। कुछ इसे पूर्व सैनिकों में पैठ बढ़ाने का कदम भी बता रहे हैं. लेकिन ऐसा नहीं है। पूर्व सैनिकों के लिए तो वी के सिंह पहले से ही मौजूद हैं। हरियाणा में भी बीजेपी की अपनी सरकार है। दरअसल दलबीर सुहाग ही वो शख्स है जिसकी अगुवाई में भारत ने पहले म्यांमार और फिर पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक्स कीं। भारत में पाकिस्तान और उसका आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा है। सर्जिकल स्ट्राइक मोदी सरकार का सबसे बड़ा पराक्रम है। ऐसे में दलबीर सुहाग को बीजेपी में शामिल कराकर या उनका समर्थन लेकर  क्या साधा जा रहा है यह बताने की जरूरत नहीं है।
Yashbharat
बीजेपी की सम्पर्क सूची में समाज के विभिन्न वर्गों में नाम कमाने वाले कई अन्य महानुभाव भी शामिल हैं। आप चाहें तो संघ के कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी की मौजूदगी को भी इसी चश्मे से देख सकते हैं। कुलमिलाकर  दूसरे की लोकप्रियता का खुद के लिए लाभ उठाने का बीजेपी का यह गज़ब का प्लान है जिसमे फिलहाल कांग्रेस मात खा गयी है। आगाज बेहतर है , अंजाम वक्त बताएगा।