मध्‍यप्रदेश में अध्यापकों के लिए विभागीय परीक्षा में भी ‘आरक्षण’

भोपाल। नए संवर्ग (प्राथमिक शिक्षक, माध्यमिक शिक्षक और उच्च माध्यमिक शिक्षक) में आने के बाद अध्यापकों की पदोन्नति में सरकार ने ‘आरक्षण” का प्रावधान कर दिया है। अध्यापकों को पदोन्नति के लिए विभागीय परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ेगी।

परीक्षा में सामान्य वर्ग के अध्यापक को 50 फीसदी और अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग व दिव्यांगों को 40 फीसदी अंक लाना अनिवार्य होगा। अध्यापक संगठन और सपाक्स समाज संस्था ने इसका विरोध शुरू कर दिया है।

सरकार ने हाल ही में अध्यापकों का स्कूल शिक्षा और जनजातीय कार्य विभाग में संविलियन का फैसला लिया है। स्कूल शिक्षा विभाग ने नए संवर्ग के लिए नियमों के प्रस्तावित प्रारूप में यह प्रावधान किया है। जिसे कैबिनेट मंजूरी दे चुकी है।

अब नियम बनाए जाएंगे और सामान्य प्रशासन, विधि विभाग की सहमति के बाद राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे। इसके बाद प्रदेशभर में काम कर रहे दो लाख 37 हजार अध्यापकों का नए नियम और शर्तों के साथ स्कूल शिक्षा और जनजातीय कार्य विभाग में संविलियन कर दिया जाएगा।

प्रदेश में ‘पदोन्‍नति में आरक्षण” को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहे कर्मचारियों में वर्ग आधारित भेदभाव शुरू हो गया है। इस लड़ाई की वजह से प्रदेश में अधिकारियों व कर्मचारियों की पदोन्नति रुकी हुई है। इसके बाद भी पदोन्‍नति नियमों में आरक्षण का प्रावधान करने पर सपाक्स समाज संस्था ने आपत्ति जताई है।

संस्था के अध्यक्ष हीरालाल त्रिवेदी कहते हैं कि राजनीति मप्र की शिक्षा को बर्बाद कर रही है। नियुक्ति के समय आरक्षण का लाभ दिया जा चुका है, तो बार-बार ये लाभ क्यों दिया जा रहा है। वे कहते हैं कि परीक्षा में प्राप्तांकों में मार्जन देना इसी श्रेणी में आता है। ये वर्ग विशेष ही नहीं पूरे प्रदेश के बच्चों के साथ खिलवाड़ है। बच्चों को शिक्षा देने वालों में ऐसी भावना भरना गलत है।

एक्सपर्ट कमेंट …

सामान्य वर्ग के साथ अन्याय

ये एक के बाद दूसरा आरक्षण है, जो सरासर अनुचित है। सीधे शब्दों में इसे सामान्य वर्ग के साथ अन्याय कहा जा सकता है। सरकार ऐसा कर योग्यता के पैमानों का भी उल्लंघन कर रही है।

केएस शर्मा, पूर्व मुख्य सचिव