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महाभियोग पर बंटी कांग्रेस, क्या साबित हो पाएंगे आरोप?

नई दिल्ली। भारत के प्रधान न्यायधीश (CJI) दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने भले ही उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को नोटिस दे दिया हो, लेकिन सीजेआई पर लगाए गए आरोपों को साबित करना इतना आसान नहीं है. दरअसल, सीजेआई दीपक मिश्रा पर महाभियोग लाने को लेकर कांग्रेस में ही दो धड़े बन चुके हैं. एक धड़ा जहां महाभियोग प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं. वहीं, दूसरा धड़ा इसके खिलाफ है.

विपक्ष ने जिन 5 वजहों को आधार बनाते हए सीजेआई पर महाभियोग लगाने का प्रस्ताव तैयार किया है. वो आरोप भी पुख्ता नहीं हैं. ऐसे में पहले से बंटी विपक्ष के लिए इन आरोपों को साबित करना भी आसान नहीं होगा. दरअसल, 1968 के जज इन्क्वायरी एक्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए आरोप ‘निश्चित’ होने चाहिए, ताकि उनके आधार पर जांच कराई जा सके.

कांग्रेस के कई नेताओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि महाभियोग जैसा बड़ा फैसला लेने से पहले कांग्रेस कार्यसमिति से चर्चा होनी चाहिए थी. लेकिन, ऐसा नहीं किया गया. ऐसे में ये नेता पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं.

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खराब आचरण का आरोप:- विपक्ष ने सीजेआई के खिलाफ पहला आरोप खराब आचरण का लगाया है. कांग्रेस का आरोप है कि सीजेआई दीपक मिश्रा का व्यवहार उनके पद के मुताबिक नहीं है. कई मामलों में वो सुप्रीम कोर्ट के बाकी जजों की राय नहीं लेते. उन्होंने कई मामलों में संवैधानिक आदर्शों का उल्लंघन किया.

प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट से फायदा उठाना:- विपक्ष ने सीजेआई पर दूसरा आरोप प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट से फायदा उठाने का लगाया है. विपक्ष का आरोप है कि सीजेआई दीपक मिश्रा ने इस मामले में दाखिल सभी याचिकाओं को प्रशासनिक और न्यायिक परिपेक्ष्य में प्रभावित किया. क्योंकि, वह प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट से जुड़े सभी मामलों की सुनवाई करने वाली बेंच की अगुवाई कर रहे थे. ऐसा करके उन्होंने जजों के आचार संहिता (code of conduct) और आदर्शों की अवहेलना की.

रोस्टर में मनमाने तरीके से बदलाव:- विपक्ष ने सीजेआई दीपक मिश्रा पर सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर में मनमाने तरीके से बदलाव करने का आरोप लगाया है. विपक्ष का कहना है कि सीजेआई ने कई अहम केसों को दूसरे बेंच से बिना कोई वाजिब कारण बताए दूसरे बेंच में शिफ्ट कर दिया. कई अहम मामले जो दूसरी बेंच में विचाराधीन थे, ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ के तहत सीजेआई ने उन मामलों को भी अपनी बेंच में ट्रांसफर कर लिया.

अहम केसों के बंटवारे में भेदभाव का आरोप:- विपक्ष ने सीजेआई दीपक मिश्रा पर अहम केसों के बंटवारे में भेदभाव का आरोप भी लगाया है. दरअसल, सीबीआई स्पेशल कोर्ट के जज बीएच लोया का केस सीजेआई ने सीनियर जजों के होते हुए जूनियर जज अरुण मिश्रा की बेंच को दे दिया था. जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों ने जब न्यायिक व्यवस्था को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, तब इस मामले को प्रमुखता से उठाया भी था.

जमीन अधिग्रहण का आरोप:- विपक्ष ने सीजेआई पर पांचवा आरोप जमीन अधिग्रहण का लगाया है. विपक्ष के मुताबिक, जस्टिस दीपक मिश्रा ने 1985 में एडवोकेट रहते हुए फर्जी एफिडेविट दिखाकर जमीन का अधिग्रहण किया था. एडीएम के आवंटन रद्द करने के बावजूद ऐसा किया गया था. हालांकि, साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद उन्होंने जमीन सरेंडर कर दी थी.

कांग्रेस की सत्ता में तीन बार लाया गया महाभियोग प्रस्ताव
दिलचस्प बात यह है कि पहले तीन मौकों पर उस वक्त महाभियोग प्रस्ताव लाए गए थे, जब कांग्रेस केंद्र की सत्ता में थी. मई 1993 में जब पहली बार सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी रामास्वामी पर महाभियोग चलाया गया, तो सीनियर एडवोकेट के रूप में कपिल सिब्बल ने ही लोकसभा में बनाई गई स्पेशल बार में उनका बचाव किया था. कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के वोटिंग से गैरमौजूद रहने की वजह से यह प्रस्ताव गिर गया था. उस वक्त केंद्र में पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी.

जस्टिस रामास्वामी के अलावा वर्ष 2011 में जब कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया, तो भी कांग्रेस की ही सरकार थी. सिक्किम हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में न्यायमूर्ति पी डी दिनाकरण के खिलाफ भी इसी तरह की कार्यवाही में पहली नजर में पर्याप्त सबूत मिले थे. लेकिन, उन्हें पद से हटाने के लिए संसद में कार्यवाही शुरू होने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था.

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