कृषि उपज मंडी में चल रहा सिंडीकेट, एक-एक किलोग्राम करके चुरा लेंगे 6 करोड़ का गेहूं!

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जबलपुर। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी समितियों में चल रही गेहूं की खरीदी धीरे धीरे जोर पकड़ती जा रही है। इसके साथ ही किसानों के साथ लूटमार भी बढ़ती जा रही है।

खरीदी केन्द्रों में किसानों से ले रहे एक किलो ज्यादा, समिति, ट्रांसपोटर से लेकर वेयरहाउस संचालक मिलकर चला रहे पूरा सिंडीकेट

जबलपुर जिले के 70 खरीदी केन्द्रों में चल रही गेहूं की तुलाई में एक ओर जहां प्रत्यक्ष रूप से तो धांधली चल ही रही है वहीं अप्रत्यक्ष रूप से से ज्यादा तुलाई करके किसानों को लगभग 6 करोड़ का चूना लगाये जाने का भी कारनामा चल रहा है। इस बार लगभग तीस लाख क्विंटल गेहूं खरीदी का अनुमान है और यदि एक क्विंटल में एक किलो का गेहूं चुराया जाता है तो फिर इस हिसाब से आंकड़ा 6 करोड़ पहुंच जाएगा।

ऐसे हो रही चोरी
नियमानुसार जो किसान खरीदी केन्द्र पर अपना गेहूं लेकर आता है उसकी गेहूं की तुलाई पचास किलो और वारदाने का वजन 600 ग्राम मिलाकर पचास किलो 600 ग्राम तौला जाना चाहिए कुछ गेहूं परिवहन व भंडारण में गिर जाता है जिसे मिलाकर सामान्यतः एक बोरे में लगभग 50700 की तुलाई होना चाहिए लेकिन खरीदी केन्द्रों पर किसानों से 51 किलो 300 ग्राम से लेकर 52 किलो और कहीं तो उससे भी ज्यादा की तुलाई की जा रही है जिसे अलग अलग खरीदी केन्द्रों पर स्वयं कलेक्टर छवि भारद्वाज एसडीएम श्री अरजरिया व एसडीएम श्री सेनगुप्ता द्वारा रंगे हांथों पकड़ा गया है। जिस पर समिति संचालक घटी आने का बहाना बनाते हैं जबकि उसी गेहूं को गोदाम के अंदर तौला जाता है तो 50 ग्राम से सौ ग्राम तक की घटी आती है। ऐसे में समितियां एक क्विंटल पर एक किलो से ज्यादा गेहूं सीधे सीधे तौल रहीं हैं जिसका न तो कागजों में कोई हिसाब है और नही किसान को इसका किसी भी प्रकार का भुगतान किया जाता है। करोड़ों का यह गेहूं कहां जाता है इसका पैसा कौन रखता है किसी को नहीं पता।
ऐसे होता है काम
आंखों से काजल चुरा लेने वाली चोरी की तरह खुलेआम चल रही इस लूटमार के पीछे पूरा एक सिंडीकेट काम कर रहा है। पहले तो किसानों के गेहूं को समिति में रोक लिया जाता है और उसे न तौलने के अनेक बहाने बताये जाते हैं। जब किसान परेशान हो जाता है तो फिर समितियां अपनी शर्तों पर उससे गेहूं की तुलाई नीयत मानक से ज्यादा करती हैं और आखिरी में परेशान किसान इसके लिए तैयार हो जाता है। किसान को कभी नमी का बहाना बताया जाता है तो कभी मिट्टी और कुसी की अधिकता बताकर ज्यादा तौल लिया जाता है जबकि सरकार के नियमों में साफ है कि किसी भी तरह से बिना एसएक्यू का गेहूं नहीं लिया जाएगा और इसी बात का बहाना बनाकर ज्यादा तौल कर ली जाती है।
इनको होता है फायदा
यदि सीधे सीधे देखा जाये तो प्रत्यक्ष रूप से इस तरह की खरीदी से किसान को तो नुकसान हो रहा है लेकिन किसी को स्पष्ट रूप से फायदा होते नजर नहीं आ रहा है लेकिन जब इसकी गहराई से तब्तीश की गयी तो पता चला कि तुलाई के बाद जब किसान अपने घर चला जाता है तो रात के समय बिना सिली हुई बोरियों से गेहूं निकाल लिया जाता है क्योंकि इस खेल में समिति पूरी तरह से शामिल होती है और पल्लेदार भी उसके होते हैं तो अक्सर तुलाई होनेके दूसरे दिन ही सिलाई होती है जिससे रात को गेहूं निकाला जा सके। जबकि गेहूं की तुलाई हो चुकी होती है तो फिर किसान भी अपनी उपज छोड़कर चला जाता है। इस चुराए हुए गेहूं को बाद में समिति और पल्लेदारों के द्वारा बेच दिया जाता है। इस तरह की चोरी सबसे ज्यादा सिहोरा के केन्द्रों में होती है।
समितियों के साथ साथ ट्रांसपोटर भी इस ज्यादा तुलाई का फायदा उठाता है जहां तुलाई भंडारगृहों में नहीं हो रही है वहां गेहूं की खरीदी के बाद उसे भंडारण के लिए अधिकृत परिवहन कर्ता के द्वारा भंडारगृहों में भेजा जाता है। इस दौरान जो अतिरिक्त गेहूं बोरों में होता है उसमें से कुछ मात्रा ट्रांसपोटर के लोगों के द्वारा रास्ते से रफा दफा कर दी जाती है।
यहां है पूरी जड़
इस पूरे भ्रष्टाचार के खेल में सबसे बड़ी जड़ वेयरहाउसिंग है जिसे ऐसे समझ सकते हैं कि गोदामों में जो गेहूं रखा जाता है वह पचास किलो प्रति बोरा के हिसाब से रिकॉर्ड में दर्ज होता है जबकि वह वास्तव में 51 से 52 किलो के बीच होता है। यदि वारदाने का वजन घटा दें तो भी एक बोरे में 500 से 700 ग्राम ज्यादा गेहूं आ रहा है जबकि रिकॉर्ड में उसकी कोई एंट्री नहीं होती। इस खेल को ऐसे समझ सकते हैं कि जो गेहूं भंडारगृहों में रखा जाता है उन्हें भंडारित मात्रा से एक प्रतिशत ज्यादा देना होता है जो कि बारिश के दौरान गेहूं की सीरत के हिसाब से वह नमी पकड़ता है और उसका वजन बढ़ जाता है। लेकिन समिति प्रबंधकों के कारनामें के चलते जो वजन प्राकृतिक रूप से बढ़ना चाहिए वह तो पहले ही वेयरहाउस संचालकों को बढ़ा कर दे दिया जाता है ओर फिर बारिश के दौरान गेहूं का नमी के कारण वजन बढ़ जाता है। यदि एक एक बोरे को देखा जाए तो मात्रा पांच से सात सौ ग्राम ही दिखती है लेकिन जब पूरे गोदाम का हिसाब किया जाता है तो एक औसत आकार की गोदाम में ट्रकों से एक्सेस माल बचता है जिसका मालिक कोई नहीं होता ओर फिर संचालक इसे बाजार में बेचकर मोटी कमाई करता है। इस पूरे खेल में समितियों को ज्यादा तुलाई करने के लिए ज्यादातर वेयरहाउस संचालक मोटी राशि देते हैं ताकि उनकी गोदाम में एक्सेस गेहूं आ सके।
सबको है जानकारी
जबलपुर जिले की लगभग एक सैकड़ा गोदामें ऐसी हैं जहां पर हजारों क्विंटल एक्सेस गेहूं पड़ा हुआ है जिसका कोई हिसाब नहीं है जिसे वेयरहाउस संचालक अपना बताकर दबाए बैठे हैं जबकि वह गेहूं शासकीय है लेकिन इस करोड़ों रुपए के गेहूं का कोई भी दस्तावेजों में जिक्र न होनेके कारण गोदाम संचालक इसे अपना बता रहे हैं जबकि एक एक दाना गेहूं शासन द्वारा खरीदकर गोदामों में रखवाया गया था । इस पूरे कारनामें की जानकारी एमपी वेयर हाउसिंग व नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों को है लेकिन वे खामोशी की चादर ओढ़े हुए हैं क्योंकि इस गेहूं की बंदरबांट में अधिकारियों का भी हिस्सा होता है। ऐसे में वे सब जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं। यदि इस बार भी ऐसा हुआ तो फिर करोड़ों का गेहूं खुर्दबुर्द हो जाएगा।

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