जातिवाद को बढ़ावा दे रहे 80 स्कूलों का फिर से हुआ नामकरण

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नेशनल डेस्क: मध्यप्रदेश सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए जातिवाद को बढ़ावा दे रहे स्कूलों का फिर से नामकरण किया है। ये स्कूल प्रभावशाली जातियों के नाम पर थे जो उन क्षेत्रों में विभाजन पैदा कर रहे थे।

लोगों का कहना है कि सरकार ने यह कदम उठाकर ‘देर आए दुरुस्त आए’ कहावत को चिरतार्थ कर दिया हैै। ये कार्रवाई लगभग एक महीने तक चली जो कि ​रविवार को समाप्त हुई। सिंगरौली जिले में 15 से 50 वर्ष पुराने लगभग 80 स्कूलों के नाम बदल दिए हैं। अब इन स्कूलों का नाम प्रमुख भारतीयों के नाम पर रखा गया है जिसमें जाति का कोई लेना-देना नहीं है।
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भोपाल से 780 किलोमीटर से पूर्व सिंगरौली में प्राइमरी, मिडल और हाई स्कूल शामिल हैं जो 15 से 50 वर्ष पहले के बने हुए हैं। शुरू में इन स्कूलों के नाम सुविधा के अनुसार जाति ​के आधार पर रखा जाता था। स्थानीय स्कूल के एक अध्यापक ने बताया कि जब क्षेत्र में इन स्कूलों को शुरू किया गया था तो उनके नाम स्थानीय आबादी के नाम पर रखे गए। ये सब पहचान बनाने के ​लिए रखे गए। दुर्भाग्यपूर्ण अगर स्कूल का नाम दलित जाति के नाम पर रखा गया तो स्वर्ण जाति के लोग अपने बच्चों को इस स्कूल में भेजने से संकोच करते थे। उनकी सोच यह थी कि ये स्कूल एक विशेष जाति के बच्चों के लिए बनाए गए हैं। धिरे-धिरे जाति के आधार पर बच्चों के बीच भी विभाजन शुरू हो गया।
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सिंगरौली के कलेक्टर अनुराग चौधरी ने बताया कि जिले के विभिन्न स्थानों को दौरा करने पर पाया कि बहुत से स्कूलों के नाम बसोर टोला, हरिजन बस्तीए गोदान टोला, बैगा बस्ती, विरानी तोला के नाम पर थे। जब ग्रामीणों से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ये नाम जाति के नाम पर हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि इससे बच्चों में विभाजन की भावना बड़ी है। चौधरी ने कहा कि हमने मार्च में उन स्कूलों की पहचान करनी शुरू कर दी जो जाति के आधार पर बनाए गए। जिला पंचायत ने 80 स्कूलों की पहचान की और ग्रामीण कमेटी से कहा कि स्कूलों का नाम प्रसिद्ध लोगों के नाम पर रखा जाए। अब इन स्कूलों पर कोई जाति का टैग नहीं है। अब डॉ अंबेडकर, स्वामी विवेकानं, दमहारानी रानी दुर्गावती, चंद्रशेखर के नाम पर इन स्कूलों के नाम रखे गए।
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क्षेत्र के लोगों का कहना है कि अब अन्य जिलों में भी जाति के आधार पर स्कूलों के नाम नाम रखने की परंपरा बदलनी चाहिए ताकि कोई स्कूल न बटे। मध्यप्रदश के समाज सेवक राकेश मालवीय का कहना है कि पहले इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। स्कूलों के नाम जाति पर रखना एक समजिक गलती है। मगर कई जिलों मे ऐसे कई स्कूल हैं जिसमें न केवल छात्र बल्कि अध्यापक भी बच्चों से भेदभाव करते हैं। ऐसा कर हम स्कूली बच्चों में जातिवाद की भावना पैदा करते हैं। जो हमारे देश के भविष्य के लिए बहुत खतरनाक है। मध्यप्रदेश टिचर एसोसिएशन ने कहा कि ऐसा कदम बहुत पहले उठाया जाना चाहि था। स्कूल बच्चों को प्रेरित करने के लिए होते हैं लेकिन उन पर एक विशेष जाति की मुहर लगाना बहुत गलत है।

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