नर्मदा परिक्रमा के बाद बोलीं अमृता- अब मन की यात्रा शुरू हो चुकी है

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इंटरनेट डेस्क। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा यात्रा खत्म हो गई. इस दौरान उनकी पत्नी अमृता सिंह भी उनके साथ थी. अमृता सिंह ने मीडिया से बातचीत करते हुए नर्मदा परिक्रमा यात्रा के अनुभव साझा किए. उन्होंने कहा कि परिक्रमा में पैर अब थम गए हैं लेकिन मन की यात्रा शुरू हो चुकी है।

अमृता सिंह ने कहा कि एक अजीब सी भावदशा में हूं. अब नर्मदा का किनारा मेरी आंखों से ओझल है. मैं वेदना से पूर्ण हो रही हूं. प्रकृति की आभा और उल्लास का रंग पिछले छह महीने से मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा था. सूर्यकिरणों की सुनहरी चादर नर्मदा के जल पर जैसे ही बिखरती थी, उसका अनुपम सौंदर्य आंखों में जैसे भरता ही नहीं था. परिक्रमा की सारी थकान इस सौंदर्य चेतना में सराबोर होकर जैसे अपना रास्ता भूल जाती थी।

नदी मुझसे बात कर रही थीं.
इन छह महीनों में मेरा और नदी का एक खास रिश्ता बन चुका था. नर्मदा मुझसे बात कर रही थीं. कभी मां के रूप में कभी एक करीबी दोस्त बनकर तो कभी बड़ी बहन की तरह. अब परिक्रमा औपचारिक रूप से खत्म हो चुकी है. लेकिन कई अनगिनत यादें, अनगिनत कहानियां, अनगिनत लोग, नदी किनारों की संस्कृति, उनका जीवन मेरे अंर्तप्रवाह में बना हुआ है. कभी यह मुझे आनंद के क्षणों की अनुभूति दे रहा है, तो कभी मेरी आंखों से अश्रृधारा बनकर मुझे साल रहा है. कहने के लिए तो मेरी परिक्रमा खत्म हो चुकी है, लेकिन यह अंर्तप्रवाह नर्मदा की नई यात्रा शुरू कर चुका है.

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पति के हौंसले ने ताकत दी

शहरी जीवन जिसे हाई लेवल कंफर्ट जोन की आदत हो, उसे छोड़कर नर्मदा परिक्रमा करना इतना आसान नहीं था. मैंने राज्यसभा टीवी से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद मेरे पति श्री दिग्विजयसिंह ने कहा यह सही समय है अब परिक्रमा की जा सकती है. मुझे इतना अनुमान नहीं था. इसका स्वरूप क्या होगा. परिक्रमा शुरू होते ही तीन चार दिनों तक तो खूब उत्साह रहा. लेकिन बाद में शरीर बोलने लगा. मैं पैरों में एडियों में दर्द से कराहने लगी. दवाइयां, डॉक्टर्स, सब चलता रहा लेकिन आराम नहीं हआ. रोज का 15 से 20 चलना मुश्किल साबित हो रहा था. दिग्विजयसिंह जी रोज मुझे हौंसला देते तुम आराम से चल पाओगी. मैं स्वयं भी उनका जज्बा देखती और सोचने लगती मुझे तो चलना ही है. किसी ने कहा गाड़ी में बैठ जाओं लेकिन मैंने प्रण किया था, मैं ऐसा तो नहीं करूंगी.

महुआ के फूलों से दर्द छूटा
बाद में ख्याल आया कि ज्यादा तलफील तो सड़कों पर चलने से हो रही है. कच्चे रास्ते पर चलना बेहतर है. हमने वैसा ही किया. फिर भी दर्द तो बना ही रहा. आखिर एक फीजियोथेरेपिस्ट का बताया नुस्खा काम आया. वह था एडियों के नीचे रूई से एक नर्म सा मोटा तल, जिसे जूतों के भीतर रखा जा सके. इससे थोड़ी सी बात बनीं. और शायद धीरे धीरे दर्द सहने की ताकत भी बनने लगी. हम आगे बढ़ते गए. फिर गुजरात पहुंचे जहां पर मुझे अमिताजी एक आश्रम में मिलीं उन्होंने मुझे महुआ के फूलों की अह्रमियत बताते हुए कहा कि इसकी भांप को और इसे पैरों में बाधकर चलो तकलीफ नहीं होगी. और वाकई मेरा दर्द गायब होता चला गया.

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रेत खनन, बांधों से नुकसान
नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं है. वह जीवन है, वह संस्कृति है, वह अध्यात्म है, सृष्टी की अलौकिक भेट है. जिसमें अनुमप सौंदर्य के साथ मानव मात्र के कल्याण के लिए कई रहस्यमयी वनस्पतियों का खजाना है. मुझे दुख है कि आधुनिकरण, और दुनायावी किस्म की होड़ ने नर्मदा की इस पवित्रता के साथ खिलवाड़ की है. अवैध रेत उत्खनन, बांधों के कारण हो रहा विस्थापन नर्मदा के पवित्र रूप को छिन्न – भिन्न कर चुका है. वेगड़ की किताबों में जिस अनुपम सौंदर्य की बात कही गई है उसकी तलाश में मैं चल रही थी लेकिन वह मुझे अंततक दिखाई नहीं दिया.

जंगलों वनस्पतियों का मुआवजा कौन देगा
हम बांधों से होने वाले विस्थापन की भरपाई तो लोगों को मुआवजा देकर कर रहे हैं, लेकिन नर्मदा के किनारे जो अनमोल जंगल और नायाब पक्षी प्रजातियों की बस्ती थी, उसका मुआवजा क्या होगा? आज हमें फिर से सोचना होगा कि हम किस तरफ जा रहे हैं. विकास की ओर या अपने विनाश की ओर.

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घोर गरीबी लेकिन जीवन उल्लासित
मैंने अपनी पूरी परिक्रमा में एक जबर्दस्त बात देखी है. वह है लोगों का जीवन के प्रति नजरियां. आदिवासी, साधु, और घोर गरीबी में जी रहे लोग. बावजूद इसके पूरी तरह उल्लास और उमंग से भरे हुए. अपना सर्वस्व परिक्रमा करने वाले लोगों पर लूटाने को तत्पर. एक मात्र नर्मदा परिक्रमा ऐसी यात्रा हो जहां लोग खालि हाथ आते हैं, और नर्मदा के बाशिंदे उन्हें आश्रय भोजन देकर धन्य हो जाते हैं. ऐसा प्रेम सौहार्द और कहां पर मिलेगा. पूरे रास्ते में श्री दिग्विजयसिंह और मुझे लोगों का जो अपनापन प्रेम मिला है, उसकी ऋण हम शायद ही उतार पाएं.

राजनीति मेरा विषय नहीं
इस परिक्रमा को लेकर बहुत से अनुभवों को मैंने डाक्यूमेंट किया है. पता नहीं इसको किस रूप में मैं आगे लेकर आउंगी. लेकिन इतना जरूर है कि मेरी यह यात्रा अब रूकने वाली नहीं. अब इसे अपनी अध्यात्मिक और सामाजिक यात्रा मानती हूं. और मैं अब रूकने वाली नहीं जो कुछ भी नर्मदाजी की बेहतरी के लिए कर सकू वह मैं अवश्य करूंगी. और निश्चत ही इसका कोई राजनीतिक मकसद नहीं है. क्योंकि राजनीति मेरा विषय नहीं है. मैं अपनी इस पूरी यात्रा का श्रेय अपनी पति को दूंगी जिनकी वजह से यह एक तरह का कठिन तप हम पूरा कर पाएं।

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