ICHR ने रामसेतु पर शोध का इरादा छोड़ा, 17.5 लाख साल पहले बना था यह पुल

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नई दिल्ली। ऐतिहासिक अनुसंधान की भारतीय परिषद (आइसीएचआर) अब राम सेतु के मानव निर्मित या एक प्राकृतिक संरचना होने का पता लगाने के लिए शोध कराने के अपने फैसले से पीछे हट गया है। इस सरकारी संस्थान के नवनियुक्त अध्यक्ष अरविंद जमखेडकर ने कहा है कि वह ऐसा कोई शोध नहीं करवाने जा रहे हैं। यहां तक कि वह किसी और संस्था के इस शोध को करने के लिए धन भी मुहैया नहीं कराएंगे।

विगत पांच मार्च को ऐतिहासिक अनुसंधान की भारतीय परिषद (आइसीएचआर) का पदभार ग्रहण करने वाले जमखेडकर ने रविवार को एक इंटरव्यू में कहा कि एक इतिहासकार ने ऐसा प्रोजेक्ट शुरू करने का एक प्रस्ताव रखा था। लेकिन परिषद के सदस्य इस प्रोजेक्ट के खिलाफ हैं। परिषद के इस फैसले को पलटते हुए जमखेडकर ने कहा कि यह इतिहासकारों का काम नहीं है कि वह इस तरह से खुदाई का काम कराएं। इस काम के लिए कई संस्थाएं हैं जैसे- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) है। आइसीएचआर अधिकतम इतना ही कर सकता है कि किसी अन्य संबंधित संस्थान से इस काम को कराने की सिफारिश कर सकता है।

उल्लेखनीय है कि पिछले साल मार्च में ही परिषद ने कहा था कि जलमग्न अति प्राचीन राम सेतु (एड्म्स ब्रिज) प्राकृतिक है या मानव निर्मित यह पता लगाने के लिए समुद्र जल के अंदर एक वैज्ञानिक शोध करवाया जाएगा। जमखेडकर के पूर्ववर्ती वाई. सुदर्शन राव ने एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की घोषणा की थी। और शोध बाद में कराने की बात कही थी।

तमिलनाडु के पामबन द्वीप को श्रीलंका के मन्नार द्वीप से जोड़ने वाला यह प्राचीन पुल मौजूदा समय में भी बीस किमी से अधिक लंबा है। बताया जाता है कि वर्ष 1487 में भीषण तूफान में यह नष्ट हो गया था। अन्यथा यह समुद्र की सतह के ऊपर था।

17.5 लाख साल पहले चूने की चट्टानों से बना था विशाल पुल

पूर्ववती राव से इस प्रोजेक्ट को बंद किए जाने के बारे में पूछने पर उन्होंने इस पर कुछ भी कहने से इन्कार कर दिया। राव ने यह जरूर कहा कि उन्होंने इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी लेकिन जब तक वह काम शुरू करते उनका कार्यकाल खत्म हो गया था। राम सेतु विवादों में तब आया जब पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने सेतुसमुद्रम परियोजना को शुरू करने के लिए प्राचीन रामसेतु को तोड़ने की सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मांगी। इसके बाद देश भर में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे।

गौरतलब है कि हिंदुओं के धर्म ग्रंथों के मुताबिक भारत और श्रीलंका के बीच स्थित रामसेतु लाखों वर्ष पहले भगवान राम ने लंका जाने के लिए वानरों की सेना से बनवाया था। हाल ही में डिस्कवरी साइंस चैनल ने भी कुछ शोधकर्ताओं के हवाले से बताया था कि चूने के विशाल पत्थरों से बने इस पुल को 17.5 लाख साल पहले कहीं और से यहां लाकर बनाया गया था। कार्बन डेटिंग शोध के दौरान इसकी चट्टानों को रामायण काल का पाया गया है। उससे पहले अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी भी रामसेतु की सैटेलाइट इमेज जारी करके ऐसा ही दावा कर चुकी है।

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