बनने से पहले सुलगते सवाल:महागठबंधन तो बना लोगे पर सर्वमान्य नेता कहां से लाओगे

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राजनीतिक डेस्क। 2019 में लोकसभा चुनाव सरकार बनाम विपक्ष होने वाला है, इसका नजारा अभी से दिखने लगा है। हालांकि असली विपक्ष कौन है? उसका मुख्य चेहरा कौन बनेगा? इसके लिए भी दो सुपर वुमैन खेमेबंदी कर रही हैं। पहले सोनिया और अब ममता बनर्जी कोलकत्ता से निकलकर दिल्ली प्रवास पर हैं। सोमवार को दिल्ली पहुंचने के बाद ममता ने दो दर्जन नेताओं से मुलाकात कर उनकी नब्ज टटोली। ममता के अलावा अमित शाह और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली ताकतवर बीजेपी का सामना करने के लिए सोनिया ने भी डिनर डिप्लोमेसी का सहारा लिया था। जिसमें शरद पवार, रामगोपाल यादव, सतीश चंद्र मिश्रा, जीतनराम मांझी और बाबूलाल मरांडी जैसे तमाम नेता शामिल हुए थे।
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ममता की लामबंदी का दायरा
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने स्तर पर तमाम विपक्षी दलों से चर्चाओं का दौर शुरू किया है। मंगलवार को कई क्षेत्रीय दलों से मुलाकात की है और वह जल्द ही सोनिया गांधी से भी मिलकर महागठबंधन की रूपरेखा व रणनीति पर चर्चा करेंगी। लेकिन भारतीय राजनीति में इस तरह बनने वाले तमाम महागठबंधनों के पहले भी कई उदाहरण देखने को मिलते रहे हैं। एक वक़्त में कांग्रेस का देश की राजनीति में वो क़द हुआ करता था जो आज भाजपा का है, और तब कांग्रेस का विरोध करने के लिए सभी विपक्षी दलों ने जनता पार्टी का गठन किया था। लेकिन आख़िर में ये गठबंधन भी सफल नहीं हो सका और तब से लेकर आज तक इस तरह एकजुट विपक्ष बनने की ये प्रक्रियाएं असफल होती दिखाई दी हैं।
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विपक्ष में दरार के बड़े कारण 
देश के तमाम विपक्षी दल इस समय सांप्रदायिकता के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। इस मुद्दे पर सभी दलों में आपसी सहमति दिखाई भी दे रही है, लेकिन क्या इस सहमति के साथ विपक्ष पूरी ताकत के साथ बीजेपी का सामना करने में सक्षम होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी के ख़िलाफ़ जिस विपक्ष को बनाने की कोशिशें हो रही हैं उसे तीन कमज़ोरियों का सामना करना पड़ेगा। इनमें से पहली कमज़ोरी है एक ऐसे नेता की कमी जिसे पूरा विपक्ष अपना नेता मानने के लिए तैयार हो और जिसे देश भी स्वीकार करे। दूसरी कमज़ोरी ये है कि विपक्ष के पास कोई कार्यक्रम नहीं है जिसे वह देश के सामने पेश कर सके। नोटबंदी से लेकर जीएसटी पर सरकार की फ़जीहत होने के बाद भी विपक्ष देश के सामने कोई कार्यक्रम पेश नहीं कर सका। तीसरी कमज़ोरी विपक्षी पार्टियों के काडर से जुड़ी हुई है। बीते समय में सभी विपक्षी पार्टियों का संगठन कमज़ोर ही हुआ है। वहीं, बीजेपी की ताकत ही उसका संगठन है।
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कौन होगा विपक्ष का सर्वमान्य नेता
कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी भले ही औपचारिक रूप से अध्यक्ष हों, लेकिन गठबंधन से जुड़ी चर्चाएं सोनिया गांधी ही कर रही हैं। सोनिया गांधी ने ही हाल ही में डिनर पार्टी का आयोजन किया था। इसके साथ ही विपक्षी दलों को साथ लाने में राहुल गांधी को सक्रिय भूमिका निभाते नहीं देखा जा रहा है। सोनिया भी यह जानती है कि कई ​दलों को राहुल की लीडरशीप पर भरोसा नहीं है, यही कारण है कि 2019 तक यूपीए की कमान सोनिया अपने ही हांथ में रखेंगी।

महागठबंधन बना तो होगा कितना दमदार
इस महागठबंधन को कमजोर करने के लिए भी तीसरा मोर्चा कमान संभाले हुए है। यह कहा जा सकता है ​कि बीजेपी के ख़िलाफ़ एकजुट विपक्ष बनाने की तैयारियों के बीच विपक्ष की वो दरारें भी सामने आ रही हैं जिनसे तीसरा मोर्चा निकल सकता है। इनमें कुछ क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस के साथ अनमने ढंग से जुड़ना भी शामिल है। तृणमूल और एनसीपी और केसीआर इसके उदाहरण हैं। ऐसे में जैसे-जैसे 2019 में होने वाले आम चुनाव नज़दीक आएंगे वैसे-वैसे विपक्षी सरगर्मियां तेज़ होती जाएंगे। लेकिन बीजेपी को कड़ी टक्कर देने के लिए इस महागठबंधन को तमाम तरह के राजनीतिक लिटमस टेस्ट से गुज़रना होगा।

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