पहले दहेज़ कानून फिर SC/ST एक्ट: संसद से सड़क तक चर्चा, कौन हैं जस्टिस गोयल और ललित

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वेब डेस्क। सुप्री कोर्ट ने बीती 20 मार्च को एक अहम् फैसला सुनाते हुए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी/एसटी एक्ट 1989) के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी. इस फैसले का मोदी सरकार के दो मंत्रियों रामदास अठावले और रामविलास पासवान ने भी खुलकर विरोध किया और लोक जनशक्ति पार्टी ने बुधवार को इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका भी दाखिल कर दी है. कोर्ट के इस फैसले को लेकर दलित समाज में आक्रोश है और कई राज्यों में इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया जा रहा है.

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद 2015 में संशोधन लाकर इस कानून को सख्त बनाया था. इसके तहत विशेष कोर्ट बनाने और तय समय सीमा के अंदर सुनवाई पूरी करने जैसे प्रावधान जोड़े गए हैं. 2016 को गणतंत्र दिवस के दिन से संशोधित एससी-एसटी कानून लागू किया गया था. 1955 का प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट प्रभावी नहीं था और इससे दलितों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों में कमी नहीं देखी जा रही थी इसलिए साल 1989 में इस कानून को बनाया गया था.

क्या सच में हो रहा था गलत इस्तेमाल
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा 2016 में जारी आंकड़ों पर नज़र डालें तो एससी/एसटी एक्ट के तहत जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने वाले लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर एक रिपोर्ट जारी की गई थी. रिपोर्ट बताती है कि देशभर में जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने के 11060 शिकायतों की जांच पुलिस ने की. इन शिकायतों में से 935 शिकायतें झूठी पाई गई थी. हालांकि इसके बावजूद भी इस कानून के दुरुपयोग का कोई ठोस आंकड़ा मौजूद नहीं है. इस फैसले में कोर्ट ने खुद 2015 के आंकडों के हवाले से कहा है कि 15 से 16 फीसदी मामलों में पुलिस क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर देती है और 75 फीसदी मामलों में अभियुक्त छूट जाते हैं.

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दहेज़ कानून से एससी/एसटी एक्ट
जस्टिस एके गोयल और उदित यू ललित की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि एससी/एसटी एक्ट से जुड़े मामलों में अब खुले मन से सोचने की जरूरत है. अगर किसी मामले में गिरफ्तारी के अगले दिन ही जमानत दी जा सकती है तो उसे अग्रिम जमानत क्यों नहीं दी जा सकती? बता दें कि इसी पीठ ने जुलाई 2017 में एक फैसला सुनाते हुए दहेज निरोधक क़ानून के दुरूपयोग पर भी चिंता जाहिर की थी और कहा था कि आरोपों की पुष्टि के बगैर कोई गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए. तब भी इन दोनों ने निर्देश जारी करते हुए कहा था कि मुकदमे के दौरान हर आरोपी की अदालत में उपस्थिति अनिवार्य नहीं होनी चाहिए और अधिकतर शिकायतें वाजिब होती ही नहीं हैं.

एससी/एसटी एक्ट वाले मामले में भी कोर्ट ने तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है. फैसले के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है और जो लोग सरकारी कर्मचारी नहीं है, उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से ही हो सकेगी. इसके अलावा ‘जातिसूचक शब्द’ इस्तेमाल करने के आरोपी को जब मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाए तो उस वक्त उन्हें आरोपी की हिरासत बढ़ाने का फैसला लेने से पहले गिरफ्तारी की वजहों की समीक्षा करनी चाहिए.

कौन हैं जस्टिस उदय यू ललित और एके गोयल


जस्टिस उदय यू ललित के खाते में बतौर वकील कई सारे मशहूर केस दर्ज हैं. ललित ने ही बीजेपी प्रेजिडेंट अमित शाह के लिए तुलसी प्रजापति एनकाउंटर में केस लड़ा था. उनकी नियुक्ति की कहानी भी काफी दिलचस्प है. जस्टिस ललित का नाम साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए तब सामने आया था जब तत्कालीन एडवोकेट जनरल गोपाल सुब्रमणयम का नाम लिस्ट से हटा दिया गया था. मिली जानकारी के मुताबिक CBI की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि 2जी केस के दौरान सुब्रमणयम छुपकर आरोपी ए राजा के वकीलों से मिले थे. बताया जाता है कि ललित की नियुक्ति पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच खींचतान भी हुई थी.

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बहरहाल जस्टिस ललित ने सलमान खान के लिए काला हिरन केस, पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह पर दायर भ्रष्टाचार के केस, अभी-अभी बीजेपी से कांग्रेस में आ गए नवजोत सिंह सिद्धू के लिए मर्डर केस, हवाला कारोबारी हसन अली के लिए मनी लॉन्डरिंग केस, सरकार की तरफ से 2जी घोटला जैसे मामलों में अपनी वकालत का हुनर दिखाया है. उधर जस्टिस गोयल की बात करें तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने साल 1999 में सीनियर वकील के तौर पर नियुक्ति दी थी. दो साल बाद उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में जज नियुक्त किया गया. दिसंबर 2011 में जस्टिस गोयल को गुवाहाटी हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया और अक्टूबर 2013 में उनका तबादला उड़ीसा हाई कोर्ट में किया गया था.

क्या हैं नई गाइडलाइंस
1. ऐसे मामलों में निर्दोष लोगों को बचाने के लिए कोई भी शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा. सबसे पहले शिकायत की जांच डीएसपी लेवल के पुलिस अफसर द्वारा शुरुआती जांच की जाएगी. यह जांच समयबद्ध होनी चाहिए. जांच किसी भी सूरत में 7 दिन से ज्यादा समय तक न हो. डीएसपी शुरुआती जांच कर नतीजा निकालेंगे कि शिकायत के मुताबिक क्या कोई मामला बनता है या फिर तरीके से झूठे आरोप लगाकर फंसाया जा रहा है?
2. ऐसे मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जाएगी. सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है और जो लोग सरकारी कर्मचारी नहीं है, उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से हो सकेगी. हालांकि, कोर्ट ने यह साफ किया गया है कि गिरफ्तारी की इजाजत लेने के लिए उसकी वजहों को रिकॉर्ड पर रखना होगा.
3. सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल की बात को मानते हुए कहा कि इस मामले में सरकारी कर्मचारी अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं.
4. एससी/एसटी एक्ट के तहत जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने के आरोपी को जब मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए तो उस वक्त उन्हें आरोपी की हिरासत बढ़ाने का फैसला लेने से पहले गिरफ्तारी की वजहों की समीक्षा करनी चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि इन दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने वाले अफसरों को विभागीय कार्रवाई के साथ अदालत की अवमानना की कार्रवाही का भी सामना करना होगा.

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ऐसी भी क्या जल्दी थी ?
बता दें कि मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद 2015 में संशोधन लाकर इस कानून को और मजबूत बनाया था. ये संशोधन भी देश की संसद से ही पारित किया गया था. कानून बनाने के मामले में संविधान ने संसद को ही सर्वोच्चता दी है जबकि न्यायपालिका के हिस्से सिर्फ कानून की समीक्षा करने का हक है. इस मामले में भी यही सवाल उठाया जा रहा है कि सरकार को सलाह देने की जगह कोर्ट ने क्यों इतनी जल्दबाजी दिखाते हुए गाइडलाइंस जारी कर दीं. दहेज़ कानून से जुड़े फैसले में भी इसी तरह के सवाल सामने आए थे.

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