तो क्या CJI के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी में है कांग्रेस !

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(अन्य वेब स्त्रोत)। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा एक बार ​फिर बड़ी परेशानी में घिरते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस ने दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाए जाने की तैयारी शुरू कर दी है। इतना ही नहीं कांग्रेस ने कई अन्य दलों से भी महाभियोग प्रस्ताव का प्रस्तावित मसौदा भेजकर उनका समर्थन मांगा है। हालांकि इस बारे में अभी तक पार्टी की तरफ से आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं की गई है। सूत्रों की माने तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता माजिद मेमन ने इस बात की पुष्टि की है।
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माजिद मेनन किया खुलासा
कांग्रेस नेता मेमन ने इस बात का खुलासा करते हुए कहा है कि , ‘कांग्रेस, चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है। मैंने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किया है और मुझे इस बारे में इससे अधिक कुछ नहीं पता।’ गौरतलब है कि सीजेआई दीपक मिश्रा के खिलाफ उन्हीं के समकक्ष चार अन्य जजों ने न्यायिक प्रशासन में अनियमितता का आरोप लगाते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस किया था। देश के इतिहास में सुप्रीम कोर्ट के जजों का यह पहला प्रेस कॉन्फ्रेंस था, जिसमें सीजेआई के खिलाफ चार अन्य जजों ने गंभीर आरोप लगाए थे।
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चार जज भी हुए थे लामबंध
जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसफ ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर सवाल उठाते हुए देश लोगों से ‘न्याय के सर्वोच्च मंदिर’ की रक्षा करने की अपील की थी। चारों जजों ने मिश्रा पर मामलों को उचित पीठ को आवंटित करने के नियम का पालन नहीं करने का आरोप लगाया। इसके में से एक मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) के न्यायाधीश बीएच लोया की रहस्यमय परिस्थिति में हुई मौत से संबंधित याचिका को उचित पीठ को न सौंपे जाने का था।
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यह है महाभियोग लाने का नियम
महाभियोग की प्रक्रिया जटिल है। संसद के वर्तमान स्वरुप को देखते हुए, विपक्ष इस प्रक्रिया को पहले चरण से आगे ले जाने में सक्षम नहीं होगा। इस प्रक्रिया में अनुच्छेद 124 (2), 124 (4), 124 (5) और जजेज़ इन्क्वायरी एक्ट, 1968 की अहम भूमिका होती है। इस प्रकार, सबसे पहले महाभियोग के प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा के 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों द्वारा दी जाती है। राज्यसभा में विपक्ष के पास इसके लिए पर्याप्त संख्या है। इसके बाद, लोकसभाध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति इस प्रस्ताव को ठुकरा या स्वीकार कर सकते हैं। अगर किसी तरह से इन चरणों को पार कर लिया गया, जिसकी संभावना क्षीण है, तब एक समिति का गठन किया जायेगा जिसमे सुप्रीम कोर्ट के जज, किसी एक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश और एक नामचीन जूरिस्ट शामिल होंगे। यह समिति संबंधित जज, इस मामले में भारत के मुख्य न्यायधीश, के खिलाफ एक ठोस आरोपपत्र तैयार करेगी. यह समिति एक बेंच के तौर पर कार्य करेगी और जरुरी लगने पर गवाहों से पूछताछ करेगी। अपनी कवायद पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपेगी। अगर समिति महाभियोग प्रस्ताव को मान लेती है, तो उसे दोनों सदनों में दो – तिहाई बहुमत से पारित होना जरुरी है। अभी सभी विपक्ष दलों को मिलाकर भी इतना बहुमत नहीं है. इसके आलावा, समिति द्वारा जज को दोषी मान लिए जाने के बावजूद संसद उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का विकल्प चुन सकती है। अगर इस चरण को भी पार कर लिया जाता है, जोकि पिछले मामलों में नहीं हुआ, तो राष्ट्रपति से उस जज को बर्खास्त करने की सिफारिश की जायेगी। राष्ट्रपति ऐसा तभी करेंगे जब संसद के दोनों सदनों द्वारा उस जज को बर्खास्त करने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया गया हो। भारत में महाभियोग का सामना करने वाले जजों की सूची ज्यादा लंबी नहीं है. इस सूची पर निगाह डालने से यह साफ़ होता है कि यहां महाभियोग की प्रक्रिया कभी भी आखिरी मुकाम तक नहीं पहुंची, लेकिन इसने जजों को इस्तीफा देने के लिए मजबूर जरुर कर दिया।

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