डाउन सिंड्रोम के इलाज के लिए सभी जिलों में बनेंगे ‘समर्पण’ केन्द्र

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भोपाल। चपटा चेहरा, छोटी गर्दन व कान, कम मांसपेशियां, आंखों की पुतलियां उपर उठी हुई, शरीर छोटा, चलने में लड़खड़ाहट। ये लक्षण दिखें तो आपके बच्चा डाउन सिंड्रोम नामक बीमारी से पीड़ित हो सकता है। आमतौर पर धारणा रहती है ऐसे बच्चों का कोई इलाज नहीं हो सकता है, जबकि ऐसा नहीं है। समय पर इलाज शुरू किया जाए तो बीमारी में काफी सुधार हो सकता है। इसके लिए भोपाल में सरकार ने ‘समर्पण’ केन्द्र खोला है। यहां 267 बच्चों का इलाज किया जा रहा है। अब प्रदेश के सभी जिलों में इस तरह के केन्द्र शुरू करने की तैयारी है।

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के उप संचालक डॉ. विनय दुबे ने बताया कि प्रदेश के सभी जिलों में इस तरह के केन्द्र शुरू करने का प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा गया है। प्रस्ताव को इसी महीने स्वीकृति मिलने की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि जन्मजात विकृति, शरीर में किसी तरह की कमी, बीमारी व मानिसक-शारीरिक विकास में देरी वाले 18 साल तक के बच्चों का इलाज समर्पण केन्द्र में किया जाता है। अभी हर जिलों से ऐसे बच्चों को चिन्हित कर इलाज कराया जा रहा है। समर्पण खुलने से और सुविधाएं बढ़ जाएंगी।

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यह होता है समर्पण केन्द्र में

चमकीली चीजें, रंग बदलती लाइट इस तरह के बच्चे को काफी आकर्षित करती हैं। इससे उनकी बौद्धिक क्षमता पर भी असर पड़ता है। लिहाजा समर्पण में इस तरह की चीजें रहती हैं। खेलने के सामान रहते हैं। मुख्य बीमारियों के डॉक्टर, काउंसलर भी रहते हैं। इन्हें सरकारी योजनाओं का फायदा दिलाने के लिए सामाजिक न्याय विभाग से एक कर्मचारी को पदस्थ किया जाता है।

डाउन सिंड्रोम कोई बीमारी नहीं

डाऊन सिंड्रोम कोई बीमारी नहीं, बल्कि जन्मजात विकृति है। इससे बच्चा और उसके माता-पिता जीवन भर परेशान रहते हैं। थोड़े से प्रोत्साहन व प्रशिक्षण से इससे पीड़ित बधो स्पोर्ट्‌स, आर्ट व म्यूजिक सहित अनेक क्षेत्रों में शानदार प्रदर्शन करते हैं। दिक्कत यह है कि ज्यादातर पेरेंट्स यह जान ही नहीं पाते कि उनका बधाा डाउन सिंड्रोम से ग्रसित है। वे उसकी तुलना सामान्य बधाों से कर उसे उसकी धीमी प्रगति को लेकर परेशान रहते हैं। प्रताड़ित करते हैं।

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यह बात शहर के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. आरके यादव ने कही। वे वर्ल्ड डाऊन सिंड्रोम डे के एक दिन पहले इस बीमारी के बारे में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति में क्रोमोसोम के कुल 23 जोड़ों में क्रोमोसोम नंबर 21 की पूरी या अतिरिक्ति मौजूदगी इस बीमारी का कारण बनती है। गर्भावस्था के11वें से 13वें हफ्ते में किए जाने वाले ब्लड टेस्ट, सोनोग्राफी से 90 प्रतिशत मामलों में इसका पता लगाया जा सकता है।

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