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सावन की झड़ी भले न लगे चुनावी वादों की बौछारें जारी

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जबलपुर। भले ही विधानसभा चुनाव के लिए अभी समय शेष हो, लेकिन चुनावी सरगर्मियों ने रफ्तार पकड़़ ली है। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जन आशीर्वाद यात्रा निकालकर अपनी और अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाने में लगे हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी इस बार कमर कस ली है और चुनाव को लेकर विभिन्न समितियों का गठन भी कर लिया है।

एक तरफ जहां प्रदेश अध्यक्ष की कमान कमलनाथ के हाथ सौंपी गई है तो समन्वय समिति में दिग्विजय सिंह और प्रचार अभियान के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रभार सौंपा गया है। कांग्रेस के ये नेता भी प्रदेश में घूम-घूम कर चुनावी विसात बिछाने में लग गए हैं

और पिछले तीन बार से सत्तारुढ़ भाजपा की खामियों को जनता के सामने रखकर चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में लग गई है। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री श्री चौहान अपने शासनकाल की उपलब्धियों का बखान करने में जुटे हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस सरकार की खामियों को जनता के सामने लाने सक्रिय हो गई है। वैसे चुनाव कोई भी हों चुनाव के समय पार्टी और प्रत्याशी विकास के बड़े-बड़े दावे करते हैं लेकिन उन वादों का क्या होता है यह किसी से छिपा नहीं है।

यदि आम आदमी से पूछा जाये तो वह यही कहेगा कि भैया अभी चुनाव हैं तो बड़ी-बड़ी बातें और सौगातों की बात की जा रही है। चुनाव के बाद चुनावी वादे भुला दिये जाते हैं। भाजपा हो या कांग्रेस चुनाव के पूर्व घोषणा पत्र जारी करती है। और यदि पूर्व के चुनावी घोषणा पत्रों पर नजर डाली जाये तो उसमें से कितने वादे पूरे किए गए यह स्वतः ही स्पष्ट हो जायेगा।

वर्तमान में बारिश का मौसम चल रहा है और सावन का महिना बारिश के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। लेकिन इस बार सावन शुरू होने के बाद से ही अभी तक वैसी बारिश नहीं हुई जैसी बारिश की उम्मीद की जाती रही है। अब यह अलग बात है कि राजनैतिक दलों के नेता और प्रत्याशियों के लोकलुभावन वादों पर जनता विश्वास भी कर लेती है।

और बाद में जब चुनाव हो जाते हैं और समस्याओं का निराकरण नहीं होता तो उन्हीं नेताओं को कोसती नजर आती है जिन पर विश्वास करके वह अपना कीमती वोट उन्हें देती है।
चुनावी सरगर्मियों के बीच एक तरफ जहां टिकट के दावेदार सक्रिय हो गए हैं

वहीं दूसरी तरफ जो लोग अपने आपको टिकट का दावेदार मानकर चल रहे हैं उनके द्वारा सार्वजनिक कार्यक्रमों का आयोजन भी शुरू कर दिया गया है। कोई भागवत करा रहा है तो कोई महायज्ञ। तो कहीं बुजुर्गों का सम्मान हो रहा है तो कहीं मतदाताओं को लुभाने पार्टी कार्यकर्ता लोगों से पूछ रहे हैं

कि भैया आपकी कोई समस्या तो नहीं है। कुल मिलाकर राजनीति के इस खेल में अंत में जनता ही विश्वासघात का शिकार होती है। अब देखना यह है कि आने वाले समय में होने वाले मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव में सत्तापक्ष मतदाता की नजर में खरा उतरता है या फिर परिवर्तन की बयार देखने मिलती है।

धार्मिक, सामाजिक आयोजनों में भी कुर्ता पैजामा धारी नेता बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक वे अपनी बात पहुंचा सकें। चुनाव परिणाम क्या होंगे यह तो भविष्य बतायेगा, लेकिन कोशिशें तो जारी हैं और यह कोशिशें कितनी कामयाब होती हैं यह वक्त बतायेगा।

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