जबलपुर। फर्स्ट फार्मर योजना जो कि गांव के किसानों को प्रशिक्षण एवं वेटरनरी योजनाओं के प्रचार-प्रसार को लेकर प्रारंभ की गई थी वह विवादों में घिरते नजर आ रही है। नानाजी देशमुख विश्वविद्यालय में अनियमितताएं जारी है वहां इस प्रकार के आरोप अत्यंत निंदनीय है क्योंकि अभी फोन पर ही की गई नियुक्ति का मुद्दा थमा नहीं था कि प्रचार प्रसार विभाग की फर्स्ट फार्मर योजना पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सिर्फ कागजों पर ही फर्स्ट फार्मर योजना
यदि हम बात करें इस योजना की तो इसका प्रचार प्रसार क्षेत्र पड़रिया सिल्वा छतरपुर देवी गाना है परंतु जब इन क्षेत्रों में जाकर देखा गया तो ऐसा कुछ भी प्रतीत नहीं होता कि इन योजनाओं का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।
बजट के आंकड़े
2016-17——-7,44 लाख
2017-18——–41 लाख
2018-19——–22,80 लाख
प्रश्न यह उठता है जब इतना बड़ा बजट प्रशासन ने विश्वविद्यालय को दिया है तो यह आंकड़े कैसे कागजों पर ही रह गए हैं या इनका थोड़ा सा भी हिस्सा प्रचार-प्रसार के कार्यों में लगाया जा रहा है।
क्या कार्य है फर्स्ट फार्मर योजना का
योजना के तहत एकीकृत कृषि प्रणाली द्वारा किसानों का सशक्तीकरण कृषि पशुपालन पंचगव्य मुर्गी पालन मत्स्य पालन बकरी पालन को बढ़ावा देना है परंतु यहां प्रश्न उठता है कि किन क्षेत्रों में इन प्रचार प्रसार विभाग द्वारा कार्यों को बढ़ावा दिया गया है क्योंकि जिन गांव को गोद लेकर इन योजनाओं को बढ़ाने की बात कही गई थी वहां इन प्रकार की गतिविधियों का ना होना ज्यादा पाया गया है
सौंपा ज्ञापन
वहीं फर्स्ट फार्मर योजना में हो रही भारी अनियमितताओं को लेकर तथा कुलपति की वर्तमान कार्यप्रणाली को लेकर बैठ नहीं संस्थान में राम संगठन ने प्रबंधन मंडल के सदस्य को ज्ञापन सौंपा ज्ञापन के दौरान संगठन के संयोजक शशांक त्रिपाठी ने प्रबंधन मंडल सदस्य को बताया कि कैसे फर्स्ट फार्मर योजना में सरकारी धन का दुरुपयोग हो रहा है और कर्मचारियों द्वारा पैसों का बंदरबांट भी हो रहा है सदस्यों ने आरोप लगाया कि विस्तार विभाग के निदेशक डॉक्टर नायक की कार्यप्रणाली संदिग्ध हैं । कुलपति की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं कि कैसे तानाशाही रवैया को अपनाते हुए उनके द्वारा फोन पर ही रीवा विश्वविद्यालय में प्रभारी डीन को नियुक्त कर दिया।

