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राज्य सूचना आयोग में पसरा सन्नाटा, आयुक्त ही नहीं तो कौन करेगा सुनवाई ?

नेशनल डेस्‍क। सत्ता और विपक्ष की आपसी खींचतान ने ना केवल सूचना आयोग के काम-काज की रफ्तार पर ब्रेक लगाया है, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया में भी हो रही देरी की वजह से सैंकड़ो अपील की फाइलें आज भी खुलने और सुनवाई का इंतजार कर रही है.

देश के हर राज्य में सूचना आयोग फरियादियों के मामलों को निपटाने में लगा हुआ है, लेकिन उत्तराखण्ड के सूचना आयोग में सुनवाई ही नहीं हो रही है. दरअसल, सूचना आयुक्त नहीं होने के कारण यहां कोई काम नहीं हो रहा है. प्रदेश में सूचना आयुक्त के सभी चारों पद खाली पड़े हैं और सिर्फ मुख्य सूचना आयुक्त अकेले ही सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं. राज्य सूचना आयोग के ठप पड़ जाने से लोगों को कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

राजनैतिक दलों के फेर में उलझने के कारण पिछले तीन साल में सरकार एक भी सूचना आयुक्त की नियुक्ति नहीं कर पाई. साल 2015 में सूचना आयुक्त अनिल शर्मा और प्रभात डबराल का कार्यकाल समाप्त हुआ, इसके बाद 2017 में विनोद नौटियाल को सूचना आयुक्त बनाया गया. मई 2018 में सूचना आयुक्त राजेंद्र कोटियाल और 7 जून को सूचना आयुक्त एसएस रावत का कार्यकाल खत्म हुआ. आयोग का इतिहास सूचना आयुक्त की नियुक्ति से ज्यादा सूचना आयुक्त के कार्यकाल खत्म होने पर ही रहा है.

सत्ता और विपक्ष की आपसी खींचतान ने ना केवल सूचना आयोग के काम काज की रफ्तार पर ब्रेक लगाया है, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया में भी हो रही देरी की वजह से सैंकड़ो अपील की फाइलें आज भी खुलने और सुनवाई का इंतजार कर रही है. साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सूचना आयोग में काम काज ठप होने का लाभ उन विभागों को मिलता है जो जानकारियां देने में आनाकानी करते हैं

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