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राजनीति-किस्सा कुर्सी काः मजाक में ही सही सच कह गए हैं शिवराज?

bhopal baithak amit shah
भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को जो नजदीक से जानता है, उसे पता है कि वे कभी किसी से सीधा मुकाबला नहीं करते. शालीनता और सौम्यता उनके मूल स्वभाव में है. मामला अपने राजनीतिक विरोधियों का हो या अपने प्रतिद्वंदियों का वे चुपचाप अपनी चालों से उन्हें मात करते रहे हैं.
लेकिन इस समय वे कुछ असहज हैं. उनकी बॉडी लैंग्वेज उनका व्यवहार इस बात की तस्दीक कर रहा है कि कुछ ऐसा हो रहा है जो उनके लिए अप्रिय है. और इससे भी बढ़कर उनके एकाधिकार को चुनौती दे रहा है.

दर्द छलक उठा
माना जा रहा है कि भोपाल के आनंद विभाग के एक कार्यक्रम में मजाक में ही सही लेकिन उनका दर्द छलक उठा है. दरअसल पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम को देखा जाए तो यह मजाक हकीकत के कुछ करीब लगता है कि – “मैं तो जा रहा हूं सीएम की कुर्सी पर कोई भी बैठ सकता है.”

मिशन 2019 का अप्रत्यक्ष दबाव
दरअसल प्रदेश के राजनीतिक माहौल में यह महसूस होने लगा है कि तीन बार के मुख्यमंत्री रहे शिवराज एक अलग किस्म के दबाव में है. एंटी इनकमबेंसी के चलते चौथी प्रदेश में सरकार बनाना बड़ा चैलेंज है वहीं 2018 के चुनाव पर प्रधानमंत्री मोदी के मिशन 2019 का एक अप्रत्यक्ष दबाव लगातार बना हुआ है.

रिजल्ट देने का टास्क
पिछले दो चुनाव में केंद्र में यूपीए की सरकार थी. जिसके कारण एक केंद्र की राजनीतिक दखल उन पर नहीं थी. लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद हालात बदल गए हैं. सरकार चलाने की अतिरिक्त जवाबदेही और रिजल्ट देने का टास्क उनके उपर दिखाई देता है.

जिलों का नहीं सरकार का रिपोर्ट कार्ड
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीति आयोग द्वारा चिन्हित किए गए प्रदेश के 8 पिछडे जिलों के कलेक्टरों के साथ मीटिंग की और एक एक का रिपोर्ट कार्ड मांगा कि ये जिले पिछड़े क्यों रह गए. कई कलेक्टरों के जवाब से वे संतुष्ट नहीं हुए. उन्हें चेतावनी दे गए कि जनता तक योजनाओं का क्रियान्वयन की ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी. इसे एक तरह से शिवराज सरकार के कमजोर रिपोर्ट कार्ड के बतौर देखा गया.

राजनीतिक परेशानियां
सरकार से हटकर कुछ राजनीतिक मामलों की बात करें तो वहां भी शिवराज सिंह थोड़े परेशानी में दिखाई देते हैं. प्रदेश अध्यक्ष के बतौर नंदकुमार चौहान की बिदाई और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के करीबी राकेश सिंह का अध्यक्ष बनना संगठन पर उनके एकाधिकार को खत्म करता है. संगठन के इस बदलाव से तय हो गया है कि अब टिकटों के वितरण में सरकार पर संगठन भारी होगा.

बेतुके फैसले
अपने खिलाफ उठ रहे विरोध से शिवराज किस तरह निपटते हैं, इसका ताजा उदाहरण – बाबाओं को दिया गया राज्यमंत्री का दर्जा है. जिन्होंने नर्मदा किनारे रोपे गए साढ़े छह करोड़ पौंधों का घोटाला उजागर करने की धमकी दी थी. इस घटना की तीखी प्रक्रिया हुई और शिवराज को संघ मुख्यालय तक तलब किया गया.

इसी तरह का मामला मंदसौर किसान आंदोलन का है, जिसे दबाने के लिए शिवराज ने पुलिस फायरिंग में मारे गए किसानों को एक –एक करोड़ का मुआवजा दिया. जिसे लेकर भारी विवाद भी हुआ.

शिवराज के नेतृत्व में नियंत्रण में नहीं
इन घटनाओं के बाद अटकलें चलती रहीं कि शिवराजसिंह को केंद्र में ले जाया जा रहा है और मुख्यमंत्री के पद पर नरेंद्रसिंह तोमर, नरोत्तम मिश्रा जैसे नाम दावेदार हैं. यूपी की योगी सरकार की तरह दो उपमुख्यमंत्री बनाने की अटकलें भी जारी हैं.

हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस तरह की अटकलो को खारिज करते हुए कई बार कहा कि चुनाव तो शिवराज के नेतृत्व में ही होगा. लेकिन भाजपा के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि पार्टी हाईकमान शिवराज के नेतृत्व की बात कर रहा है लेकिन शिवराज को नियंत्रण या एकाधिकार नहीं दे रहा है.

सारे सूत्र हाईकमान के पास
कर्नाटक चुनाव के बीच में शुक्रवार को अमित शाह भोपाल में है. और प्रदेश भर के पांच हजार से ज्यादा मंडल से लेकर जिले तक के कार्यकर्ताओं को चुनावी समय में झोकने के लिए तैयार कर रहे हैं. इसने भी राजनीतिक सुर्खियां बटोरी हैं. पिछली बैठकों में शामिल हो चके एक पूर्व ‌विधायक का कहना है कि शाह की मौजूदगी यह अहसास करवाती है कि चुनाव का सारा काम हाईकमान से तय होगा. मंत्री हो या ‌विधायक उसकी पहली हैसियत तो पार्टी कार्यकर्ता की है.

चिंता बढ़ाने वाले दो मोर्चे
पहला प्रदेश की माली हालत खराब है, राज्य पौने दो सौ लाख करोड़ के कर्जे में है. इसी बीच किसानों के असंतोष संभालना बड़ा मसला हो गया है. भावांतर जैसी योजनाएं चल रही हैं, जिसका खामियाजा यह है कि प्रदेश के वित्त विभाग ने इरिगेशन जैसे महत्वपूर्ण ‌विभाग में काम ठप्प कर दिया है. छोटे-बड़े ठेकेदारों के भुगतान रोक दिए गए हैं. काम रोक दिए हैं. जिसका सीधा असर गर्मी के बाद दिखाई देगा.

स्वभाव के विपरीत सख्ती
एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी बताते हैं कि जिस तरह मुख्यमंत्री प्रशासनिक अफसरों को बैठकों में धमकाने लगे हैं, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. अतिरिक्त दबाव ने उन्हें सख्ती बरतने पर मजबूर कर दिया है.

जनता से ज्यादा पार्टी में ज्यादा असंतोष
पार्टी सूत्रों का कहना है कि आज भी जनता के बीच शिवराज सरकार को लेकर बहुत बड़ा असंतोष नहीं है लेकिन भाजपा के भीतर ज्यादा नाराजी है. जिसके तार पार्टी हाईकमान तक जुड़ रहे हैं. शिवराज के खिलाफ अंदरूनी बैठकों में विवाद तक हो रहे हैं.

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