झाबुआ। ये कहानी जिले के छोटे से गांव आम्बा खोदरा की तीन महिलाओं की है। ये आदिवासी अंचल की ‘पेडवुमन’ हैं। दो साल से गांव में ही एक पुराने स्कूल के कमरे में सेनेटरी पेड बनाती हैं। 8 पेड का एक पैकेट 25 रुपए में गांव की महिलाओं को बेचती हैं।
महिलाओं की बैठकों, ग्रामसभाओं में काउंटर लगाकर विक्रय करती हैं। उनके गांव के अलावा आसपास के चार गांवों की महिलाएं अब उनसे पेड खरीद रही हैं। दो साल पहले शुरू किए गए इस काम की बात जब इन्होंने परिवार और गांव वालों के बीच रखी तो पुरुषों ने विरोध किया। इन्होंने पुलिस में शिकायत करने की धमकी दे दी तो विरोध खत्म हो गया।
महिलाएं बताती हैं, पहले पहल बुजुर्ग महिलाओं ने इस तरफ आना बंद कर दिया था। सब कहते थे, ये गंदा काम कर रही है। गांव में क्या खुलकर ऐसा काम होता है। कुछ तो यहां तक आती थी तो मुंह पर कपड़ा रखकर आती थी। पेड बनते देखना उन्हें घिनौना लगता था, लेकिन धीरे-धीरे सोच बदल गई। सबसे पहले हमने ही कपड़ा छोड़कर हमारे ही बनाए पेड इस्तेमाल करना शुरू किए। धीरे-धीरे गांव की दूसरी महिलाओं ने अपने और बहू-बेटियों के लिए खरीदे। इसके फायदे देखे तो उपयोग बढ़ता चला गया। अब सब खुश हैं और कोई विरोध नहीं करता।
ढाई लाख की यूनिट, एक लाख का कच्चा माल
गांव में ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत बने स्व सहायता समूह की सदस्य हेमलता भाबोर ने सबसे पहले ये विचार अपनी साथियों के सामने रखा। ग्रामसभा में बात रखी। ना नुकुर के बाद सब सहमत हो गए। हेमलता, गुड्डी पारगी और भूरी भाबोर ने मिलकर मिशन के अधिकारियों से मिलकर लोन मांगा। 3 लाख 20 हजार रुपए का लोन मिला। 2 लाख 20 हजार में सारी मशीनें आ गई और एक लाख का कच्चा माल ले लिया। आजीविका मिशन से ही तीन दिन का प्रशिक्षण मिला और पंद्रह दिन तक अभ्यास किया। फिर अभ्यस्त हो गए। अब तक पेड बेच-बेचकर डेढ़ लाख रुपए का लोन भी चुका दिया।
शर्म से बाहर आए हम भी, दूसरे भी
हेमलता भाबोर और गुड्डी पारगी ने बताया, मासिक धर्म से जुड़ी बातों को लेकर खुलकर बात करने की जरूरत है। ये महिलाओं की सेहत से जुड़ा मामला है। पहले हम भी कपड़ा इस्तेमाल करते थे, लेकिन जब पेड देखा और इसके फायदे समझे तो खुद तय किया कि अब यही उपयोग करना है और दूसरों को भी कराना है। शर्म से बाहर निकले तो संक्रमण से बचाव हुआ। गांव की दूसरी महिलाएं भी समझने लगी।
ऐसे ही गुजर जाता जीवन
गांव की महिला काली राजेश गुंडिया का कहना है, कपड़े का उपयोग परेशान करने वाला था। संक्रमण, खुजली और दूसरी बीमारियों की शिकायत आम थी। उपयोग किए हुए कपड़े को फेंकना या साफ करना चोरी-छिपे करना पड़ता था। बहू-बेटियों के लिए ये बड़ी परेशानी थी। अब सबकुछ बदल गया।
महिलाओं की खुद की लड़ाई
ग्रामीण आजीविका मिशन में झाबुआ की कॉर्डिनेटर रही पुष्पा चौहान और अभी के कॉर्डिनेटर अमित राठौर ने बताया, ये महिलाओं के स्वयं के अधिकार की एक तरह से लड़ाई थी, जिसे उन्होंने लड़कर जीता है। अभी बिजली की कुछ समस्या है। ये समस्या हल होने पर इस उत्पाद को बाजार में भी लाए जाने की योजना है।
ऐसे बनाती हैं पेड
हेमलता ने बताया, वुड पल्प और जेल शीट को पल्वीलाइजर में पीसकर रुई बनाते हैं। सांचों में रखकर प्रेसिंग मशीन से दबाकर आकार दिया जाता है। फिर सॉफ्ट टिशु पेपर और ब्लू शीट से कवर करके पेड बनाते हैं। इनकी सीलिंग कर अल्ट्रा वॉयलेट स्टरलाइजर में डालकर रखते हैं। संक्रमण मुक्त पेड की पैकिंग की जाती है।
