जबलपुर। यशभारत द्वारा विधानसभा चुनाव 2018 को लेकर कराए गए सर्वे में एक शहर तो एक ग्रामीण की सीट का विश्लेषण प्रस्तुत किया जा चुका है। आज शहर की पश्चिम विधानसभा सीट का विश्लेषण सर्वे के आंकड़ों और मतदाता के विचारों के आधार पर प्रस्तुत किया जा रहा है।
पूर्व में प्रकाशित कैंट में जहां मतदाता का रुझान भाजपा की तरफ है वहीं बरगी में क्षेत्रीय और जातिगत समीकरण जीत-हार का कारक बन रहे हैं। इसके इतर भाजपा का गढ़ माने जाने वाली पश्चिम सीट जिस पर अब कांग्रेस का कब्जा है वह 2018 में किस करवट बैठेगी इ सका पूरा का पूरा निर्धारण भाजपा के प्रत्याशी पर ठहर गया है।
2013 में अप्रत्याशित रूप से भाजपा को पश्चिम विधानसभा सीट पर हार का सामना करना पड़ा था जिसके पीछे दो कारण थे। पहला कांग्रेस का संगठित होकर चुनाव लड़ना और दूसरा भाजपा में बिखराव। लेकिन अब चार साल बाद कांग्रेस का वह एका टूट चुका है।
वहीं भाजपा का बिखराव अब टिकिट की दावेदारी की होड़ का रूप लेता जा रहा है। जिसमें कई कद्दावर नेता के साथ-साथ संगठन के लिए लम्बे समय से काम करने वाले लोग भी टिकिट की दौड़ में लगे हुए हैं। जो भाजपा के लिए लम्बे समय से सुरक्षित माने वाली सीट पर संशय की स्थिति खड़ी कर रहा है।
यदि कांग्रेस की बात करें तो जो कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान मतदाता हैं वे अभी भी पूरी तरह से कांग्रेस के साथ जुड़े हुए हैं। जबकि कांग्रेस की ओर से विधायक मजबूत राजनैतिक पृष्ठभूमि से हैं जिसका फायदा उन्हें मतदाताओं के बीच मिल रहा है। विपक्षी विधायक होने के चलते उन्हें बहुत ज्यादा एंटी इन्किमबेन्सी का सामना नहीं करना पड़ रहा है। लेकिन 2013 में पश्चिम के कांग्रेस नेताओं ने एकमतेन होकर जो उनका समर्थन किया था वह अब उतना मजबूत नहीं दिख रहा है।
वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस को 2013 में भाजपा की टूट का जो फायदा मिला था अब यह फायदा पूरी तरह से प्रत्याशी चयन पर निर्धारित हो गया है।
यदि कांग्रेस को देखें तो उसकी तरफ से स्थिति साफ है जो कांग्रेस के मतदाता ने उन्होंने भी अपनी स्थिति साफ कर दी है लेकिन सर्वे में सबसे ज्यादा भाजपा के लिए संशय की स्थिति बनी हुई है। भाजपा का वोटर अभी प्रत्याशी चयन को लेकर पूरी तरह से भ्रम की स्थिति में है।
क्योंकि पश्चिम से बड़े-बड़े नाम टिकिट की दौड़ में हैं लेकिन वे जितने बड़े नाम हैं उनके साथ उतने ही बड़े विवाद जुड़े हुए हैं। जबकि यह क्षेत्र भाजपा ओरिएंटेट माना जाता रहा है लेकिन चेहरे की राजनीति के चलते यहां बिखराव की स्थिति भी निर्मित हो सकती है। मतदाताओं का कहना है कि वे पार्टी के लिए समर्पित हैं लेकिन उन्हें उनकी पसंद का प्रत्याशी भी चाहिए।
यदि ऐसा नहीं होता तो एक बार फिर सबक सिखाया जा सकता है। ऐसे में सर्वे के लब्बोलुआब को देखें तो पश्चिम में भाजपा मजबूत है लेकिन यह मजबूती पूरी तरह से प्रत्याशी चयन पर निर्धारित है। वहीं कांग्रेस को लेकर मतदाता संयमित व्यवहार कर रहे हैं। यदि भाजपा ने अपने बिखरे कुनबे को नहीं समेटा तो कांग्रेस इसका फायदा उठा लेगी। लेकिन बिखराव तो कांग्रेस में भी हो गया है। परन्तु वहां चुनाव व्यक्तिवाद पर लड़े जाते हैं न की संगठन और विचारधारा के पहियों पर।
