गोरखपुर। गोरखनाथ मंदिर में लगने वाले पारंपरिक खिचड़ी मेले को अगर सामाजिक सौहार्द्र और कौमी एकता का मेला कहें तो गलत नहीं होगा। मेले के 40 फीसद मुस्लिम दुकानदारों की मौजूदगी इसकी पुष्टि है। मेले से मुस्लिम दुकानदारों का रिश्ता दो-चार वर्षों का नहीं बल्कि दशकों पुराना है।
सीतापुर के रमजान पांच दशक से गन शूटिंग की दुकान सजा रहे हैं तो आबिद उर्फ सत्तू की क्राकरी की दुकान तीन दशक मेले की शोभा बन रही है।
मोहम्मद रईस दो दशक से मेले में चूड़ी बेच रहे हैं। इम्तियाज के पीतल और स्टील के बर्तन तीन दशक से यहां चमक रहे हैं। मेले से लंबे साथ की दास्तां किसी न किसी रूप में बाबा गोरखनाथ में उनकी गहरी आस्था से जुड़ी है।
85 वर्षीय रमजान बताते हैं कि 1970 में जब उन्हें फैजाबाद की नुमाइश में आने का अवसर मिला तो वहां से वह पहली बार मंदिर के खिचड़ी मेले में आए। उन्हें यहां इतना अपनापन लगा कि उसके बाद आजतक कभी गैप नहीं किया।
मंदिर से जुड़ी अपनी आस्था का जिक्र करते हुए रमजान बताते हैं कि बाबा गोरखनाथ के आशीर्वाद से ही उनके पहले बेटे को 32 साल बाद और दूसरे बेटे को 18 साल बाद संतान की प्राप्ति हुई।

