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देश में आने वाले दिनों में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस(रोगाणुरोधी प्रतिरोध) का खतरा

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नई दिल्ली। नीति आयोग ने आगाह किया है कि देश में आने वाले दिनों में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस(रोगाणुरोधी प्रतिरोध) एक ऐसा खतरा बनकर उभर सकता है। जिसपर समय रहते काबू पाने की जरूरत है। आयोग ने सुझाव दिया है कि सरकार को व्यापक सर्विलांस तंत्र विकसित करना चाहिए तभी भविष्य में इससे निपटा जा सकता है।

एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस यानी एएमआर एक ऐसी क्षमता होती है। जिसके जरिए सूक्ष्मजीवी पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर होना बंद हो जाता है। ऐसा होने पर अगर कभी व्यक्ति गंभीर तौर पर बीमार होता है और शरीर के भीतर पनप रहे अवांक्षित सूक्ष्मजीवी दवा से ज्यादा ताकतवर हो जाते हैं तो व्यक्ति का ठीक होना बेहद मुश्किल हो जाता है।

आयोग की पब्लिक हेल्थ सर्विलांस रिपोर्ट में बताया गया है कि एंटीबायोटिक दवाओं का बिना डॉक्टर के पर्चे के उपलब्ध होना, स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी न रखने वाले लोगों की तरफ से ऐसी दवा दिए जाने और बिना एंटीबायोटिक की जरूरत हुए भी इनका इस्तेमाल बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

रिपोर्ट में इस तरफ भी इशारा किया गया है कि जानवरों के चारे में भी इनके इस्तेमाल से दवा का रेसिस्टेंस पैदा होता है। वहीं पॉल्ट्री फार्म में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल से भी समस्याएं पैदा हो रही है। आयोग ने आशंका जाहिर की है कि ऐसी स्थिति में दुनियाभर में स्वास्थ्य इमरजेंसी जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।

अप्रैल 2017 में लॉन्च किया गया था नेशनल एक्शन प्लान

भारत में इस बारे में व्यापक आंकड़े न होने से ये समस्या और गंभीर हो सकती है। रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से इस बारे में नेशनल एक्शन प्लान अप्रैल 2017 में लॉन्च किया गया था लेकिन अभी कुछ ही राज्य इसको लेकर अपने यहां एक्शन प्लान शुरू कर पाए हैं।

यही नहीं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद भी सिर्फ 25 सरकारी, निजी अस्पातालों और प्रयोगशालाओं से आंकड़े एएमआआर डाटा इकट्ठा करता है जो काफी नहीं है। आयोग के मुताबिक, सरकार को इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए इसे देशी की बीमारियों के सर्विलांस व्यवस्था का हिस्सा बनाते हुए एक्शन लेना चाहिए।

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