भोपाल। सामाजिक न्याय एवं नि:शक्तजन कल्याण विभाग के 12 स्कूलों में 24 व्याख्याताओं की नियुक्ति का मामला तकनीकी पेंच में फंस गया है। विभाग ने इन पदों के लिए अभ्यर्थियों की योग्यता में स्पेशल बीएड तो शामिल किया, लेकिन उन्हें विषय विशेषज्ञता के बंधन से मुक्त रखा, जिस पर सवाल खड़े हो गए हैं।
विभाग के अफसर भी इसे लापरवाही मानते रहे पर समय से मामला सामने आने के बाद भी भर्ती प्रक्रिया नहीं रोकी। अब मप्र लोक सेवा आयोग ने चयनित शिक्षकों के साक्षात्कार शुरू कर दिए हैं और इस प्रक्रिया को रुकवाने एक संगठन हाईकोर्ट चला गया है। मामले में गुरुवार को सुनवाई हो सकती है।
मप्र लोक सेवा आयोग ने विभाग के स्कूलों में नौवीं से 12वीं के विद्यार्थियों को पढ़ाने कला, वाणिज्य और विज्ञान विषय के व्याख्याताओं के लिए दो मार्च 2017 को विज्ञापन निकाला था। चयन परीक्षा भी हो चुकी है और अब साक्षात्कार चल रहे हैं। इस बीच कई बार भर्ती का विरोध हुआ और विभाग के प्रमुख सचिव से लेकर अन्य अफसरों तक लगातार शिकायतें हुईं, लेकिन अफसरों ने न भर्ती रोकी और न ही मामले में जांच कराई।
इससे नाराज दिव्यांग बच्चों के लिए काम करने वाली इंदौर की आनंद सर्विस सोसायटी ने इंदौर हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगा दी है। दिव्यांग बच्चों के मामले में विशेषज्ञता रखने वाले कहते हैं कि शिक्षकों की नियुक्ति में विषय विशेषज्ञता का भी पैमाना होना चाहिए। वरना ऐसे ही हालात होंगे कि आर्ट्स के शिक्षक को गणित पढ़ाना पड़ेगा।
सामान्य शिक्षकों के लिए यह नियम
स्कूल शिक्षा विभाग के स्कूलों में विज्ञान विषय के व्याख्याता की नियुक्ति के लिए विषय में एमएससी व बीएड, वाणिज्य विषय के व्याख्याता के लिए एमकॉम व बीएड और ऑर्ट्स के व्याख्याता के लिए एमए व बीएड योग्यता मांगी जाती है। ऐसे ही नौवीं और 10वीं के लिए उच्च श्रेणी शिक्षकों की भर्ती होती है, जिसके लिए बीएड के साथ संबंधित विषय की योग्यता मांगी जाती है।
सिर्फ ग्रेजुएट चलेगा
विभाग ने सभी विषयों के पदों के लिए सिर्फ ग्रेजुएशन मांगा है। लोक सेवा आयोग के विज्ञापन में विषय में विशेषज्ञता का उल्लेख नहीं है।
भर्ती प्रक्रिया रोकने की मांग
इस मामले को लेकर कोर्ट पहुंचे आनंद सर्विस सोसायटी के ज्ञानेंद्र पुरोहित और वकील आशीष चौबे ने मप्र लोक सेवा आयोग और सामाजिक न्याय विभाग को पार्टी बनाया है। उन्होंने चयनित अभ्यर्थियों के साक्षात्कार सहित पूरी भर्ती प्रक्रिया निरस्त करने की मांग की है।
कोर्ट में देंगे जवाब
हमें पता चला है कि मामला हाईकोर्ट में पहुंच गया है। अब जो भी जवाब देना होगा। वहीं देंगे।
– कृष्ण गोपाल तिवारी, संचालक, सामाजिक न्याय विभाग

